परमपूज्य योग महर्षि स्वामी श्री रामदेव जी महाराज
“इस युग में भी श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धांत, आदर्श और मूल्य सार्वभौमिक, वैज्ञानिक तथा पंथनिरपेक्ष हैं। गीता का प्रत्येक श्लोक संपूर्ण सृष्टि और जीवन के कल्याण का मार्गदर्शक है। इसके अध्ययन से साधक को शाश्वत दैवी संपदा और आध्यात्मिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
डॉ. श्री संजय जी और डॉ. श्री आशू जी ने जिस प्रामाणिकता और समर्पण से यह महायज्ञ प्रारंभ किया है, वे अभिनंदन के पात्र हैं। साथ ही मातृशक्ति की प्रधान भूमिका में हमारी बेटियों ने जिस कृतज्ञतापूर्ण कार्य को संपन्न किया है, उसकी प्रशंसा के लिए शब्द छोटे पड़ जाते हैं—हृदय नि:शब्द होकर श्रद्धा से नत हो जाता है।”
सर्वश्रद्धेय कार्ष्णि पीठाधीश्वर परमपूज्य श्री गुरुशरणानंद जी महाराज
“हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि गीता परिवार के ऑनलाइन गीता साधना वर्ग परमपूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के संरक्षण एवं निर्देशन में संचालित हो रहे हैं। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र कार्य है।
स्वामीजी का जन्म पवित्र दाधीच ब्राह्मण कुल में हुआ। उन्होंने वेद और शास्त्रों का गंभीर अध्ययन अपने गुरुओं के सान्निध्य में किया और जगद्गुरु जैसे महापुरुषों से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया। उनकी वेद, महाभारत, गीता और भागवत में अटूट निष्ठा तथा प्रचार-प्रसार का अद्वितीय प्रयास उन्हें साक्षात व्यासस्वरूप प्रतीत कराता है। गुरु के जो लक्षण शास्त्रों में बताए गए हैं, वे सभी स्वामीजी में विद्यमान हैं।
उनके निर्देशन में डॉ. संजय जी और डॉ. आशू गोयल जी जैसे समर्पित सेवक और आचार्य विभिन्न भाषाओं में ऑनलाइन गीता वर्गों का संचालन कर रहे हैं, जिससे अनेकों विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। वास्तव में, ज्ञान का एक बीज भी यदि जीवन में बोया जाए तो उससे महान परिवर्तन संभव है।
गीता परिवार का यह प्रयास अत्यंत पुण्यकारी और यशस्वी है। हम सभी विद्यार्थियों के उत्साह का अभिनंदन करते हैं और समस्त आचार्यों को वंदनपूर्वक प्रणाम करते हैं। सत्य है कि विद्या दान करने से ही बढ़ती है।”
पूज्य भाईश्री रमेशभाई ओझा का संदेश
“गीता परिवार की यात्रा जिस सकारात्मकता और दिव्य ऊर्जा के साथ आगे बढ़ रही है, वह अद्वितीय है। जब साधक भगवान पर दृढ़ विश्वास के साथ भक्ति को ही अपने जीवन का केंद्र बना लेते हैं, तब वही भक्ति उन्हें प्रेरणा देती है, शक्ति प्रदान करती है और निरंतर नवीन दृष्टिकोण से सोचने की क्षमता विकसित करती है।
इसी भक्ति-शक्ति के कारण गीता परिवार की प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन विस्तृत हो रही है। तकनीकी साधनों ने इस कार्य को न केवल सरल बना दिया है, बल्कि व्यापक भी कर दिया है। यह वास्तव में समय की मांग और युग की पुकार है।”
परमपूज्य श्री जगद्गुरु राजेंद्र देवाचार्य जी महाराज मुलुख पीठाधीश्वर, वृंदावन
महापुरुषों का अन्तःकरण भगवान के अन्तःकरण से एकरूप हो जाता है।
इसलिए महापुरुषों के अन्तःकरण से किया गया संकल्प निश्चित ही भगवतकर्म होता है। भगवान का कोई संकल्प मिथ्या हो ही नहीं सकता — वह सत्य संकल्प ही होता है।
परम पूज्य स्वामी गोविंद देव गिरि जी का “हर घर गीता, हर कर गीता” यह Learn Geeta के माध्यम से किया गया संकल्प भी अद्भुत और भगवदीय कार्य ही है।
कोरोना महामारी के भीषण काल में विज्ञान युग और आधुनिक उपकरणों का उपयोग करते हुए, गीता परिवार ने 180 से अधिक देशों में इतनी बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचना और श्रीमद्भगवद्गीता का प्रचार करना — यह अभूतपूर्व कार्य किया है। आपने समग्र विश्व के सामने भारतवर्ष की महिमा, गरिमा, क्रियाशीलता, और भारतीयों के व्यक्तित्व तथा पुरुषार्थ का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसलिए आप वंदनीय हैं।
इस ब्रह्माण्ड का श्वास और प्रश्वास ही वेद हैं, और इन वेदों का तात्पर्य महर्षि व्यासकृत वेदभाष्य महाभारत में निहित है। और महाभारत का सार है — श्रीमद्भगवद्गीता। मनुष्य के कल्याण के लिए गीता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हिंदू वैदिक सनातन संस्कृति और धर्मपद्धति किसी सीमित क्षेत्र या समाज के लिए नहीं, बल्कि एक उदार, उदात्त और विराट विचारधारा है, जो समस्त विश्व की मानव जाति को अपने में समाहित करती है। मानव जाति को परम निःश्रेयस की प्राप्ति कराने वाला यदि कोई एकमात्र ग्रंथ है, तो वह है — श्रीमद्भगवद्गीता।
धन्य है गीता परिवार और उनके सेवक, जो भारतवर्ष का यह अनुपम उपहार संपूर्ण विश्व की मानव जाति तक पहुँचाने के लिए कटिबद्ध हैं।
भगवद्गीता का संदेश मानव जाति तक पहुँचाने के लिए भगवान ने स्वयं व्यास रूप में गीता का प्राकट्य किया, फिर भी संतोष नहीं हुआ। तब भगवान आदि शंकराचार्य, श्री रामानुजाचार्य, श्री रामानंदाचार्य आदि आचार्यों के रूप में प्रकट हुए और गीता शास्त्र का विभिन्न दृष्टिकोणों से विवेचन करके, उसे सबके लिए उपयोगी बनाया।
फिर भी संतोष न होने पर, महाराष्ट्र की पवित्र भूमि आळंदी पर भगवान स्वयं संत ज्ञानेश्वर महाराज के रूप में प्रकट हुए और ज्ञानेश्वरी के रूप में गीता का भाष्य किया। उसी ज्ञानेश्वरी को ज्ञानेश नंदनी के रूप में श्री संत गुलाबराव महाराज ने सरलता से समझाया।
हम मानते हैं कि महर्षि वेदव्यास, संत ज्ञानेश्वर महाराज, श्री पंढरीनाथ, और संत गुलाबराव महाराज का कृपाप्रसाद परम श्रद्धेय स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज को प्राप्त हुआ। स्वामीजी से यह कृपाप्रसाद गीता परिवार को प्राप्त हुआ, और गीता परिवार के माध्यम से यह कृपाप्रसाद आज समस्त विश्व की मानव जाति को मिल रहा है।
हमारी कामना है —
गीता परिवार निरंतर विस्तृत हो, विराट हो, और विश्व की सम्पूर्ण मानव जाति एक होकर “गीता परिवार” बन जाए।
पूज्य साधु ब्रह्मविहारी दास जी
“जब भूकंप आता है तो सहारा देने वाले स्तंभ की आवश्यकता होती है, जिसके बल पर हम खड़े रह सकें। ठीक उसी प्रकार, जब मन विचलित होता है, तब गीता का ज्ञान ही हमें संभालता है और स्थिरता प्रदान करता है।
इसलिए गीता को गर्व से पढ़ें, पढ़ाएँ और जीवन में उतारें—जैसा कि हमारे परमपूज्य गुरुदेव श्री गोविन्ददेव गिरि जी सदैव कहते हैं। गीता का संबंध केवल अर्जुन से नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति से है जो इसे अपने जीवन में आत्मसात करता है।”
पूज्य सद्गुरु जी
“Chanting of the Gita is of utmost importance. The wisdom of the Gita must reach people first and foremost.
Live life joyfully—be lively and vibrant. Never be overly serious and never withdraw from life. Embrace it fully and celebrate every moment.”
पूज्य श्री श्री रविशंकर जी
“भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान उस समय दिया था जब अर्जुन संघर्ष से टूट चुका था। आज भी परिस्थिति वैसी ही है। मानव कोरोना जैसी भीषण बीमारी से जूझ रहा था, परंतु परमपूज्य गुरु गोविन्ददेव गिरि जी की कृपादृष्टि पाकर साधक आनंदोत्सव मना रहे हैं।
यह कार्य केवल कोई ‘ज्ञान-पुंज पुरुष’ ही कर सकता है। अतः हमारे परमपूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी वास्तव में कृष्ण-स्वरूप हैं, और गीता परिवार उनकी कृपा पाकर धन्य एवं आनंदित है।”
पूज्य गोवत्स श्री राधाकृष्ण जी महाराज
“हमारा देश असंख्य मोतियों से भरा हुआ है। आवश्यकता केवल एक धागे की थी, जो इन सबको जोड़ सके।
गीता परिवार ने उस धागे का कार्य किया है—13 भाषाओं में गीता का लिपीबद्ध करके इन मोतियों को एक माला में पिरो दिया है। यह माला अभी पूर्ण नहीं हुई; नए-नए मोती लगातार जुड़ते जा रहे हैं और जुड़ते रहेंगे।
जिस दिन यह माला पूर्ण होगी और परमपूज्य स्वामीजी स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण को यह माला कंठ में पहनाएँगे—वह दिन सबसे बड़ा त्यौहार, सबसे बड़ा आनंदोत्सव और विजय दिवस होगा। उस महादिवस के लिए हम हार्दिक शुभकामनाएँ और मंगलाशंसाएँ अर्पित करते हैं।”
डॉ. एच. आर. नागेन्द्र जी
भगवद्गीता को विद्यालयों में सिखाना अत्यंत आवश्यक है।
गीता के सभी योगशास्त्र—ज्ञान योग, कर्म योग, राज योग, भक्ति योग और विषाद योग—का समेकित अध्ययन छात्रों के लिए अत्यंत फलदायी सिद्ध होता है।
अनुलोम–विलोम पद्धति से गीता का अध्ययन करने पर बच्चों को अधिक सफलता प्राप्त होती है। उनका स्वभाव स्थिर और शांत बनता है, श्रद्धा और विनम्रता का विकास होता है, तथा व्यक्तित्व में सर्वांगीण प्रगति होना स्वाभाविक है।
गीता परिवार के कार्यों की निस्संदेह अत्यधिक प्रशंसा की जानी चाहिए। हम सभी का कर्तव्य है कि गीता के अधिक से अधिक प्रसार में स्वयं को समर्पित करें, क्योंकि इसी में हमारे उज्ज्वल भविष्य का रहस्य छिपा हुआ है।
श्रीश्रीसुगुणेन्द्रतीर्थस्वामीजी महाराज
बहुकालात् अस्माभिरपि भगवद्गीताया: प्रचारः क्रियमाणः वर्तते। गोविन्ददेवगिरिमहाराजमहोदयेन अपि भगवद्गीतायाः प्रचारः सर्वात्मना क्रियते। अतः अस्माकं गीतासम्बन्धः शाश्वतः वर्तते इति वयं सन्तोषेण वदामः।
गीतापरिवारस्य आदर्शभूतस्य गोविन्ददेवगिरिमहाराजस्य, तस्य च सत्कार्यस्य महाकार्यस्य वयं हार्दिकम् अभिनन्दनं कुर्मः। भगवद्गीताप्रसारः श्रीकृष्णस्य अत्यन्तं प्रियः। अतः भगवद्गीताप्रचाररूपे श्रेष्ठमार्गे गीतापरिवारः सततं प्रवर्तमानं वर्तते। प्रथमतः तस्य एव अभिनन्दनं कुर्मः।
परम पूज्य स्वामी श्री माधव प्रिय दास जी महाराज
इतने कठिन समय में भी, जब हमने गीता रूपी कृष्ण को अपना सारथी बनाया, तब हमें विजय प्राप्त हुई।
हमारे ऋषि–मुनि आकाशवाणी से शिक्षा प्राप्त करते थे, और आज कोरोना काल की करुणा तथा स्वामीजी की प्रेरणा से इंटरनेट की “आकाशवाणी” के माध्यम से संपूर्ण विश्व श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान प्राप्त कर रहा है।
जैसे एक संकल्प बीज मिट्टी में मिलकर हरे-भरे वृक्ष में परिवर्तित होता है, वैसे ही गीता परिवार से आज संपूर्ण विश्व में गीता रूपी अनुपम आम्रवृक्ष विकसित हो रहे हैं—यह दृश्य अत्यंत आनंददायी है।
पूज्य साधवी भगवती सरस्वती जी
Online Geeta emerged as a sacred prasad during the time of the pandemic. Geeta Pariwar did not view the crisis as a problem, but as a divine opportunity—to serve, to connect and to spread the timeless wisdom of the Gita across the globe.
When I first arrived in India, Swamiji placed the Bhagavad Gita in my hands on the sacred banks of Maa Ganga. That moment—this Sangam of Guru, Ganga, and Geeta—became the turning point of my life.
Through the Gita, I found answers to every challenge, every sorrow, every question. It offered me not just teachings, but the very essence of life.
Today, I don’t live in Bharat but Bharat lives in me .
You are truly blessed—to not only learn the Gita, but to live it.”
परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज
भारतीय संस्कृति विरासत से समृद्ध है। जब हम मानवता की बात करते हैं, तो उसका मूल हमारे शास्त्रों में ही निहित है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता को समझने के लिए हमें अपने शास्त्रों का अध्ययन करना आवश्यक है, और यही कार्य गीता परिवार निष्ठा से कर रहा है।
गीता मनीषी स्वामी श्री ज्ञानानंद जी महाराज
गीता परिवार की भूमिका एक बीज (गुठली) के समान है। संत का संकल्प कितना व्यापक हो सकता है, यह देखकर आश्चर्य होता है।
बीज यदि पड़ा-पड़ा रहे तो समाप्त हो सकता है, किंतु यदि किसी कुशल माली के हाथों में आकर मिट्टी में दबाया जाए तो वह अंकुरित होता है, पल्लवित होकर विशाल आम्रवृक्ष बनता है। वह वृक्ष छाया देता है, मधुर फल देता है और अपने समान अनेकों बीज उत्पन्न करता है।
गीता परिवार की यही दिव्यता है—संत का एक संकल्प, शुद्ध लक्ष्य, सच्चा भाव और अटूट विश्वास मिलकर असंभव को संभव बना देता है।
परमपूज्य स्वामी श्री बालकानंद गिरीजी महाराज
आज मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है कि गीता परिवार पूर्ण रूप से व्रतमय जीवन जी रहा है।
एक दिन अवश्य आएगा जब संपूर्ण विश्व गीतामय हो जाएगा।
परम पूज्य स्वामी बहोंद्र तीर्थ जी महाराज
यह विशाल कार्य, जो संत की प्रेरणा से आरंभ हुआ था, कभी असंभव प्रतीत होता था। किन्तु आज उसे सार्थकता मिली है।
धर्म के उद्धार के लिए स्वयं भगवान अवतरित होते हैं और आज 5000 सेवकों का एक साथ कार्य करना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
परमपूज्य विमर्श नंदगिरी जी महाराज
आज इस अमृत महोत्सव में, अमृत प्रत्येक पल प्रवाहित हो रहा है, उसके लिए युगों-युगों से बहती आ रही सनातन संस्कृति को शत-शत नमन।
गीता वास्तव में एक “सार्वभौमिक संविधान” है, और गीता परिवार समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का अद्भुत कार्य कर रहा है। कर्मयोग के पाँच चरणों को सही रूप से समझा और आत्मसात किया जाए, तो वे केवल सुनने या बोलने के मंत्र नहीं रहते—बल्कि जीवन में उतरते हैं, आचरण में झलकते हैं।
- मैं ईश्वर का दास हूँ, सेवक हूँ।
- मैं ईश्वर द्वारा नियुक्त हूँ।
- मैं यह कार्य केवल ईश्वर की प्रीति प्राप्त करने हेतु कर रहा हूँ।
- इस कार्य में मैं अपनी पूरी प्रतिभा का उपयोग करूँगा।
- अंततः मैं इस कार्य के प्रत्येक फल को ईश्वर को ही अर्पित करूँगा।
परम पूज्य प्रणवानंद सरस्वती जी महाराज
भगवद्गीता केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु मानवता के आत्मोदय का दिव्य घोष है। इसके चार श्रोता— श्री हनुमान जी, धनुर्धर अर्जुन, संजय और धृतराष्ट्र—मानव के चार आंतरिक स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे न केवल पात्र हैं, अपितु प्रतीक हैं—हमारी जिज्ञासा, श्रद्धा, वासना और अन्धता के।
🔸 श्री हनुमान जी वे रथ के ध्वजस्तंभ पर विराजमान होकर गीता श्रवण कर रहे थे। यद्यपि वे तत्वबोध से परिपूर्ण हैं, फिर भी गीता सुनना उनके लिए आत्मनिष्ठा का पुनः स्मरण है। यह दर्शाता है कि ज्ञानी भी श्रवण करते हैं, क्योंकि गीता का श्रवण स्वयं में साधना है।
🔸 धनुर्धर अर्जुन एक महान जिज्ञासु, साधक और आत्मान्वेषी थे । उनका प्रश्न था कि —“मैं क्या करूँ?” और उत्तर में उन्हें मिला कर्तव्यबोध, आत्मतत्व का साक्षात्कार और जीवन का धर्ममार्ग। अर्जुन गीता के आदर्श श्रोता हैं — जो सुनते हैं, समझते हैं और जीते भी हैं।
🔸 संजय उनमें जिज्ञासा नहीं थी, परंतु वासना और विषयासक्ति थी। फिर भी गुरुकृपा से वह गीता सुन सके। यह दर्शाता है कि कृपा से श्रवण संभव है, भले ही अंतःकरण शुद्ध न हो।
🔸धृतराष्ट्र वह बाह्य और आंतरिक अन्धता के प्रतीक हैं। उन्होंने गीता सुनी, पर कोई परिवर्तन नहीं हुआ। संत ज्ञानेश्वरजी ने उन्हें पामर श्रोता कहा है—जो सुनते हैं, पर हृदय तक कुछ नहीं पहुँचता।
एक उद्घोषणा गीता सभी के लिए है—श्रेष्ठ और सामान्य, ज्ञानी और जिज्ञासु, आस्थावान और संशयी। समझें या न समझें, गीता पढ़ते रहना चाहिए, क्योंकि यह आत्मोद्धार और राष्ट्रोद्धार दोनों का मार्ग है। श्रीमद्भगवद्गीता के तत्वज्ञान को जानना आज के युग में अनिवार्य है।
महामहोपाध्याय स्वामी भद्रेशदास जी
आज LearnGeeta और गीता परिवार के दर्शन कर मैं अत्यंत भावविभोर हूँ। यह मेरे जीवन का धन्य क्षण है—जहाँ मुझे यह आश्वासन मिला है कि सनातन धर्म का भविष्य उज्ज्वल है। मैं निश्चिंत और सुखी हूँ, क्योंकि यह संगठन न केवल गीता का प्रचार कर रहा है, अपितु जीवन में उसका अवतरण कर रहा है। आप मुझे भी विद्यार्थी के रूप में स्वीकार कीजिये।
स्वामी विग्यानंद जी महाराज
आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम आने वाली पीढ़ी को संस्कार प्रदान करें। भगवद्गीता का अध्ययन और उसका प्रचार-प्रसार इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस महत्कार्य में गीता प्रेस, इस्कॉन, स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज के साथ-साथ गीता परिवार भी उल्लेखनीय योगदान दे रहा है।
परम पूज्य स्वामी निरंजनानंद सरस्वती जी महाराज
स्वामीजी की प्रेरणा से जो कार्य हो रहा है, वह निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति के उत्थान का एक महत्वपूर्ण कारण है और यह वास्तव में अद्भुत है। आपकी प्रगति देखकर मुझे आंतरिक प्रसन्नता हो रही है और विश्वास है कि आप प्रभु द्वारा निर्देशित मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने का प्रयत्न करते रहेंगे।
पुस्तकें पढ़ने से मनुष्य केवल तोता बनता है, परंतु सेवा करने से वह हनुमान बन जाता है। इसलिए प्रभु की सेवा ही जीवन का अंतिम ध्येय होना चाहिए।
प.पूज्य आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी पुण्यानंद गिरीजी महाराज
आपके पवित्र उद्देश्य को आशातीत सफलता प्राप्त हो और उसमें निरंतर वृद्धि होती रहे— यही मेरी हार्दिक शुभकामना है।
परमपूज्य स्वामी श्री सवितानंद जी महाराज
राष्ट्र की सुरक्षा और संतुलन के लिए गीता अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। चाहे वह राष्ट्रपति हों या प्रधानमंत्री—जो भी राष्ट्र का सर्वेसर्वा हो—उन्हें भगवद्गीता का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। जीवन में संतुलन बनाए रखने की शिक्षा हमें केवल गीता ही दे सकती है।
पूज्य युवाचार्य स्वामी श्री अभय दास जी महाराज
महामृत्युंजय मंत्र कहता है:
“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”
इस मंत्र के तीसरे चरण में जैसे खरबूजा पकने पर डंठल से स्वतः ही अलग हो जाता है, उसी प्रकार मुझे लगता है कि गीता संथा वर्ग में बार-बार अध्ययन करने से जो जीवन-शुद्धिकरण हो रहा है, उसके परिणामस्वरूप आप भी एक दिन इस तप के प्रभाव से सभी बंधनों से स्वतः ही मुक्त हो जाएंगे।
Param Pujya Shri Adwayanand ji Maharaj
I am truly amazed to see so many sadhaks, from numerous countries and diverse age groups, learning the Geeta across multiple time slots and reciting it so beautifully—whether charan-wise, shloka-wise, or even in mixed sequences! Such an extraordinary feat cannot be the result of a single individual’s wishes alone. I feel that Bhagavan Shrikrishna is once again manifesting in a unique way through Geeta Pariwar and all the dedicated sevaks, under the able guidance of Swami Govind Deo Giri Ji. This is indeed His divine will and action.
पूज्य गोरांगदास जी महाराज
गीता के पाठ, श्रवण, चिंतन, कीर्तन और चर्चा के संदर्भ में विश्वभर के विद्यार्थियों के बारे में सुनकर मैं अचंभित रह गया। इस घनघोर कलियुग में भी गीता के ज्ञान को प्रज्वलित रखने के लिए कोटि-कोटि प्रणाम और साधुवाद।
सुधांशु जी महाराज
परम पूज्य गोविंद देव गिरी जी महाराज तो एक चलती-फिरती संस्था हैं। गीता परिवार में उन्होंने केवल गीता का दीपक ही नहीं जलाया, बल्कि सबको कृष्णमय बना दिया है। इतना सुंदर कार्य देखकर मन आनंद से भर गया। जो भी स्वामीजी के अनुशासन, अनुकरण और अनुचरण में हैं, उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
स्वामी श्री जितेंद्र नाथजी महाराज
लर्न गीता मात्र गीता रटाने का प्रयास नहीं है, बल्कि जीवन-परिवर्तन का एक महान यज्ञ है। गीता के अनमोल वचनों, उसके सार और उसके भावों को धारण करते-करते जीवन में कितने ही क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। राज्यरक्षा और राष्ट्ररक्षा की सेनाएँ तो देखी थीं, परंतु अध्यात्म और संस्कृति के क्षेत्र में नीति, मूल्य और सिद्धांतों की रक्षा के लिए इतनी विराट सेना कभी देखी नहीं थी।
डॉ. साध्वी देव प्रिया
आज हम 21वीं सदी में जीवित हैं, जहाँ विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने अद्वितीय उन्नति की है। भौतिक उपलब्धियाँ पहले श्रम और समय से प्राप्त होती थीं, लेकिन विज्ञान ने इस दूरी और विलंब को समाप्त कर दिया है। परंतु, इस तेजी में हमने अध्यात्म और भावनात्मकता में कुछ खो दिया है। आज व्यक्ति ऐसे बगीचे की कामना करता है, जहाँ पेड़ पर फल और फूल खिल रहे हों, लेकिन बिना जड़ों को सींचे यह पल्लवित पौधा संभव नहीं है।
गीता परिवार के माध्यम से भगवद्गीता हमें इन जड़ों को सींचने की प्रेरणा देती है, ताकि हमारा जीवन रूपी वृक्ष अत्यंत पल्लवीत और पुष्पित हो सके। साधुवाद और अभिनंदन।
परम पूज्य स्वामी बजरंग देव जी महाराज
जैसे कुंभ मेला देखकर मन अल्हादित होता है, वैसे ही गीता पाठ के लिए मीटिंग मे प्रवेश न मिले, इतनी बड़ी भीड़ देखकर अत्यंत हर्ष हुआ। सभी कर्मयोगियों को विशेष अभिनंदन।
पूर्वकाल में किसी शुभ कार्य के लिए दक्षिण से श्रीफल उत्तर भेजा जाता था और गंगाजल उत्तर से दक्षिण ले जाया जाता था। उसी प्रकार, कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया, वह आज गीता के माध्यम से पूरे भारत और भारतीय संस्कृति को जोड़ रहा है। Learn Geeta तो इसे विश्व स्तर पर भी जोड़ रहा है।
श्री गोविंदा नंद सरस्वती महाराज जी
गीतायाः पुस्तकं यत्र यत्र पाठः प्रवर्तते। तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि तत्र वै॥
अर्थात, जहाँ भी श्री गीता की पुस्तक होती है और जहाँ गीता का पाठ होता है, वहाँ प्रयाग आदि सभी तीर्थ निवास करते हैं।
स्वामी दाता श्री रमेश्वरानंदजी
स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज केवल राष्ट्रसंत ही नहीं, बल्कि विश्वसंत के रूप में भी उभरे हैं। गीता परिवार और पूरी टीम के इस कार्य के लिए कोटि-कोटि साधुवाद।
मानस भूषण डॉ. सुमनानंद गिरीजी महाराज, महामंडलेश्वर
संदीपनी ऋषि की भूमिका की तरह, इस युग में भी स्वामी गोविंददेव गिरी जी महाराज अनेक कृष्णों को तैयार कर रहे हैं। यही कारण है कि गीता परिवार के उपक्रम से शौर्यबोध और धर्मबोध अबाधित रहेगा।
श्री संविदानंद सरस्वती जी
विश्व के समस्त लोगों को भगवद्गीता पढ़ाने का यह अद्भुत और अलौकिक कार्य लर्न गीता के माध्यम से किया जा रहा है। निःसंदेह इसे विश्व का आठवाँ आश्चर्य कहा जा सकता है।
प्रवीण चतुर्वेदी जी
भगवद्गीता मानवता की परंपरा और विश्व के लिए सर्वोत्तम योगदान है। लर्नगीता का ऑनलाइन गीता संथा वर्ग अभियान अद्वितीय और अत्यंत आनंददायक है। आज ही मैंने भी लर्नगीता में पंजीकरण कराया है। वर्तमान के narrative wars घर-घर तक पहुँच चुके हैं। ऐसे समय में हमें सजग, सतेज और संगठित रहने की आवश्यकता है, और लर्नगीता इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
स्वामी स्वात्मानंदजी महाराज
The Bhagavad Gita is the essence of wisdom. It explains the mysteries of life and the universe, while also showing us how to face and solve our problems. By learning the Gita, today’s younger generations can reconnect with their roots, and even people from other cultures—including agnostics—can experience transformation and inner light.
स्वामी चित्प्रकाशनंद जी
गीता रुपी देवी को पढने से षड् रिपू काम क्रोध मोह, मत्सर , लोभ, मद, नामक राक्षस का नाश हो जाएगा और वह साधक को स्वानंद का चक्रवर्ती सम्राट बना देगी।
स्वामी अनंत दास जी
मुझे अत्यंत आनंद हो रहा है कि आप सभी भगवद्गीता का अभ्यास कर रहे हैं। अभ्यास करने के उपरांत यह अनुभव होता है कि जिन तत्वों की खोज पाश्चात्य विद्वान कर रहे हैं, उनका वास्तविक स्रोत हमारे वैदिक शास्त्रों और विशेषकर गीता में ही निहित है। आप सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।