गीता विदुषी सौ. वंदना जी वर्णेकर
महाराष्ट्र के महानतम संत प्रज्ञा चक्षु संत गुलाबराव महाराज (जिन्हे परमपूज्य सद्गुरु स्वामी गोविंद देवगिरी जी महाराज सर्वश्रेष्ठ जगद्गुरु के रूप मे देखते है) ने 150 वर्ष पूर्व की हुई अभूतपूर्व भविष्यवाणी आज सत्य प्रतीत हो रही है। उन्होने कहा था, “एक दिन संपूर्ण विश्व का धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवत गीता बनेगी”।
प.पू. गुरुदेव की प्रेरणा से Learn Geeta के माध्यम से गत पंच वर्षों में विश्व के 180 देशों के 12 लाख गीता साधकों के कंठों से आज गीता के श्लोकों के शुद्ध उच्चारण के साथ होने वाला गुंजन इसका प्रमाण है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी उनके कार्यकाल के प्रथम वर्ष मे जिस भी देश मे गये वहां के राष्ट्रप्रमुख को श्रीमद्भगवद्गीता की अर्थ सहित प्रतियां उपहार रूप देकर यह कहा कि, “मैने गीता का उपहार दिया है, क्योंकि मेरे पास इससे बढ़कर देने के लिए कुछ नही हैं और दुनिया के पास भी इससे बढ़कर पाने को कुछ नही है।”
गीता की यह एक अद्वितीय यात्रा है। इसके अनेक आयाम है किंतु, महत्वपूर्ण आयाम क्या हो सकता है इसका मंथन करने का यह एक प्रयास है।
सद्गुरु देव के अपूर्व संदेश “हर घर गीता, हर कर गीता” का मूल उद्देश्य है दैवी संपदा युक्त, ईश्वर के प्रति निष्ठा से परिपूर्ण, जीवन को सार्थक करने की चाह रखने वाले विश्व के हर कोने में बसे सज्जन शक्ति को एक सूत्र में पिरोना।
मत्तः परतरं नान्यत्, किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं, सूत्रे मणिगणा इव॥|
( गीता अध्याय 7,श्लोक7)
वस्तुतः भगवान कहते है कि सारे विश्व को मैंने एक सूत्र मे पिरोया है, आज केवल सज्जनशक्ति के अंतर्योग की जागृति का समय आया है।
योग शब्द का व्यावहारिक सरल अर्थ है एकाकारिता, एकाग्रता, लयबद्धता, तन्मयता। वस्तुतः यह योग बाल्यकाल से हर व्यक्ति में होता है। एक बालक एकाग्रता से खेल खेलता है; नृत्यांगना अपनी भूमिका से एकरूप होकर नृत्य करती है; गायक तन्मयता से संगीत की आराधना करता है; एक शास्त्रज्ञ एकाकार होकर तत्त्वों को खोजता है; देशप्रेमी मातृभूमी के साथ लयबद्ध होकर राष्ट्रसेवा करता है। जीवन के किसी भी लक्ष्य को पाना है तो उसके साथ योग युक्त होना पड़ता है। इस तन्मयता के बिना जीवन के अनुपम तत्वों की, कलाओं की, प्रेम की, शास्त्र संशोधन की अनुभूति पाना और माध्यम बन उन्हे प्रकट कर पाना असंभव है। मनुष्य के द्वारा सृष्टी के अद्भुत कार्य संपन्न होने का कारण यह योग कला ही है। एक अर्थ से योगयुक्तता कर्म से तादात्म्य या अनुसंधान की प्रक्रिया है। किन्तु गीता का योग कर्म के अनुसंधान तक सीमित नहीं है, गीता को उससे भी दिव्य योग की अपेक्षा है।
यत:प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्व मिदं ततम् |
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव: ||
(गीता अध्याय 18 श्लोक 46)
जिस परमात्म-तत्त्व से भूत मात्रों की निर्मिती हुई, जिसने सृष्टी के कण-कण को व्याप्त किया है उसकी कर्म से अर्चना करने से कोई भी मनुष्य परम सिद्धी को प्राप्त कर सकता है। यह गीता का परम दिव्य योग है। यहाँ जाति, संप्रदायों के सारे भेद समाप्त हो जाते हैं।
गीता में भगवान इस योग के अनेक रंग प्रकट करते हुए भक्तियोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, कर्मयोग आदि का प्रतिपादन करते हैं। प्रत्येक योग एक दुसरे से जुड़ी पंखुड़ियों के समान है। एक पंखुड़ी को पुष्प से विलग किया तो पुष्प का सौंदर्य ही समाप्त हो जाएगा। जिस प्रकार एक कलाकार या वैज्ञानिक का अपने ध्येय से भावना के साथ जुड़ना अर्थात भक्तियोग हुआ। इसीप्रकार उसका ज्ञान पाना; ज्ञानयोग, संसार के अन्य विषयों को छोड उसी का चिंतन करना; ध्यान योग, इसके लिये सांसारिक मोह त्यागना; आत्मसंयमयोग, और निरंतर उस ध्येय के लिए कार्य करना; कर्मयोग ही है। किन्तु यह सारी प्रक्रियायें सृष्टि के नियंता के अनुसंधान में, उसके साथ योगमय होकर करना यही गीता के कृष्ण वचनों का परमयोग है। इसमें अभ्युदय याने भौतिक उन्नति और नि:श्रेयस् याने आत्मिक शांति अंतनिर्हित है।
सर्व कर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय:|
मद्प्रसादादवाप्नोति शाश्वती पदमव्ययम् ||
(गीता अध्याय 18 श्लोक 56)
मेरे आश्रय से कर्म करने वाला कर्मयोगी मेरे प्रसाद रुपी शाश्वत परम पद की प्राप्ति करता है।
सद्गुरु देव कहते हैं, “महाभारत के अलोक में गीता का चिंतन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण के मन में जो गीता का अर्थ है, वह जानने का प्रयास ही गीता जानना है।”
इसलिए गीता का अध्यापन करवाते समय वे बालकों में अर्जुनत्व को जागृत करने के लिए, अर्जुन में निहित दैवी संपत्तियों के गुणों का बोध कराने के पक्षधर हैं। उनके द्वारा प्रदत्त इस अमृत-पाथेय को लेकर गीता परिवार Learn Geeta के माध्यम से अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर है।
गीता के इस परम दिव्य योग से संकुचितता की दीवारें ढह जाएँगी और “वसुधैव कुटुंबकम्” की अनुपम कल्पना प्रत्यक्ष रूप में साकार होगी — यही गीता परिवार का अंतिम गंतव्य है।
अगणित गीता दीपों से आलोकित हो आकाश,
गीता ज्ञानदीप से अंतरंग भरे प्रकाश |
दीपवत् स्वयं जलें, भरें प्रकाश से दिगंत,
हम कदम-कदम चलें, गीता के महान पंथ ||