“माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:” यह हमारी भारतीय धारणा है । हमारे लिये हमारी भूमि जड पदार्थ नहीं है । वह साक्षात चैतन्यमयी जननी है । हमारा इस भूमाता से सदियों पुराना बडा गहरा संबंध है । जब जब इस राष्ट्र के ऊपर संकट के बादल मंडराये तब तब इस भूमि के लाडले सपूतों ने अपनी माता की लाज रखने के लिये अपने शीश रणयग्य में अर्पण कर दिये । भारतीयों की भारतीयता उनके इसी मातृवत्सलता में संनिहित है । हमने अपनी भूमि को न केवल माता कहा अपितु उस माता को साक्षात् जगज्जननी जगदंबा का स्वरूप माना । भारत की रग रग में बहनेवाले इस मातृभक्ति को शब्दों के माध्यम से मुखर करनेवाला महामंत्र है “वन्दे मातरम्” !
“वन्दे मातरम्” गीत वंगभूमि के सुपुत्र स्व. बंकिमचंद्र चटोपाध्याय की आनंदमठ नामक वीररस से ओतप्रोत उपन्यास का एक हिस्सा है । वैसे देखा जाए तो यह गीत बंकिमबाबू पहले ही लिख चुके थे, उपन्यास लिखने के बाद वह उसका हिस्सा बना । इस गीत का महत्त्व भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में अभूतपूर्व है । जो प्रेरणा यह गीत आज भी जगाता है वह तो हम जब जब गाते हैं तब तब अनुभव करते ही है । इस गीत का हर शब्द भारतमाता के भक्तिरस से भरा हुआ है ।
एक संस्कृत कवि कहते हैं,
लौकिकानां हि साधूनाम् अर्थं वागनुवर्तते ।
ऋषीणां पुनराद्यानां वाचमर्थोऽनुधावति ॥
अर्थात् सामान्य कवियों की वाणी अर्थ के पीछे भागती है, लेकिन ऋषियों की वाणी के पीछे अर्थ स्वयं दौडता हुआ चला आता है ! सच कहूं तो यह गीत मानवीय प्रतिभा की उपज तो लगता ही नहीं । यूं लगता है कि जैसे यह वेदों में आनेवाला कोई सूक्त हो ! इसी लिये स्वयं महायोगी श्री अरविंद बंकीमबाबू को “ऋषि बंकिम” कहा करते । वास्तव में भारतमाता के साथ आंतरिक एकात्मता हुए बिना “वन्दे मातरम्” जैसी रचना लिखी जाना भी संभव नहीं और समझ में आना भी संभव नहीं । बंकिमबाबू स्वयं जगदंबा के उपासक रहे । सन १८७५ की वह नवरात्रि कुछ विशेष थी । पराधीनता से व्यथित बंकिमबाबू अपनी गहरी भावसमाधि में थे । तभी ७ अक्तूबर १८७५, अश्विन शुद्ध अष्टमी के दिन उन्हों ने अपने मनश्चक्षु के समक्ष भारतमाता का वह दिव्य रूप देखा जिसका उन्होंने अपने गीत में वर्णन किया है । उस दिन से एक अलग सी धुन उन्हें लग गई । और इसी चिंतनप्रवाह के फलस्वरूप एक मास के अंतराल में ७ नवंबर १८७५, कार्तिक शुद्ध नवमी (अक्षय नवमी) के शुभदिन उन्हों ने इस गीत की रचना को साकार किया । लेकिन यह गीत जनमानस तक पहुंचने में कुछ वर्ष और बीत गये । बंगाल में प्रकाशित होनेवाली “बंगदर्शन” नामक पत्रिका में बंकिमबाबू द्वारा लिखित उपन्यास “आनंदमठ” सन १८८० से १८८२ तक क्रमश: प्रकाशित होता रहा । इसी उपन्यास के माध्यम से यह गीत लोगों तक पहुंचा । फिर भी जिस उद्देश से यह गीत लिखा गया था वह साध्य होता हुआ नहीं दीख रहा था । बंकिमबाबू चाहते थे कि यह गीत लोगों में नई ऊर्जा को जगाएं । एक पत्र में वे अपने एक मित्र से कहते हैं, “मैंने तो लिखा है वन्दे मातरम्, लेकिन लोगों की वृत्ति तो “वन्दे उदरम्” बन गई है !” अर्थात् सब के सब केवल पेट पालने में लगे हुए है । किंतु उन्हें विश्वास था यह क्रांति का बीज अवश्य अंकुरित होगा । आगे चलकर जब वंगभंग आंदोलन हुआ तब यह गीत वास्तव में जन जन के कंठ में सांसों की तरह घुल मिल गया ।
अंग्रेजों के दीर्घकाल तक चलें स्वाधीनता-संग्राम में हमारे वीर पूर्वजों ने प्राण दांव पर लगा दिये । एक ओर तो दुष्ट शासकों के द्वारा निर्ममता से दमन चल रहा था तो दूसरी ओर देशभक्तों की भुजाएं क्षात्रतेज से आस्फुरित हो रही थी । वह एक ऐसा प्रतिकूल समय था जब हम अपनी ही मां की गोदी में सुखपूर्वक नहीं बैठ सकते थे । चारों ओर मानों घना अंधेरा छाया हुआ था । लेकिन उस अंधेरे को चीरती हुई एक ऋषितुल्य महाकवी की वाणी गूंज उठी, “वन्दे मातरम्” !
“वन्दे मातरम्” मात्र दो शब्द नहीं थे, यह था वेदों में संनिहित राष्ट्रीयता का तेजोमय आविष्करण ! जिस जिस ने पुत्र के रूप में अपने कर्तव्य को जाना, अंधकारमय वर्तमान में भी उज्ज्वल भवितव्य के अंकुर को पहचाना उस हर योद्धा के हाथ में पांचजन्य बना “वन्दे मातरम्” ! जिस जिस ने अपने राष्ट्रजीवन को नीजी जीवन से ऊपर रखा, देश के लिये मर कर अमर होना सीखा उस हर वीर के रोम रोम से जो गूंज उठा “वन्दे मातरम्” !
“आनंदमठ” उपन्यास, जिस में यह गीत आता है, इस में संन्यासियों के द्वारा स्वाधीनता के लिये की गई सशस्त्र क्रांति की कथा वर्णित है । ये सब के सब संन्यासी अपने आपको संतान कहलाते हैं । मां भारती के संतान । इन सभी का एकमात्र लक्ष्य है, मातृभूमि को आक्रांताओं के चंगुल से मुक्त कर हिंदुराष्ट्र की स्थापना करना । इसमें एक पात्र है महेंद्र, जो अपने परिवार से बिछड गया है । उन राष्ट्रभक्त संन्यासियों में से एक है भवानंद, जो महेंद्र से मिलता हैं और आगे चलकर वही उसको अपने परिवार से भी मिलाता है । एक प्रसंग में भवानंद महेंद्र को एक गुप्त स्थान में ले जाता है जहां वह उसे अपनी आराध्या भारतमाता का वह दिव्य स्वरूप श्रीविग्रह के रूप में दिखाता है जिसकी मुक्ति के लिये उसके सभी संतान लड रहे हैं । कैसी है वह माता ? उसीका वर्णन इस गीत में किया गया है ।
इस गीत की रचना का यह १५० वा वर्ष अर्थात् शतकोत्तर सुवर्ण महोत्सव चल रहा है । हमें चाहिये की अधिक से अधिक कंठ इसे गायें तथा अधिक से अधिक हृदयों में इसका भाव झंकृत हो जाये इसके लिये हर संभव प्रयास करें !
भारत को वास्तव में जानने के लिये वास्तव में हमे अपने भीतर भारत का दर्शन करना होगा । हमारे पूर्वप्रधानमंत्री स्व. अटलजी ने जिस प्रकार कहा था, “भारत कोई जमीन का टुकडा नहीं, यह जीता जागता राष्ट्रपुरुष है !” वास्तव में भारत कैसा है ? उसे कैसे जानें ?
रेखाओं छायाचित्रों में खोज नहीं पाओगे भारत..
अंतरंग अरविंद बनाओ, बिन खोजे पाओगे भारत !
हम भी वन्दे मातरम् के अंत:स्थ भाव को भीतर उतारे और भारतमाता को विश्वगुरुपद के उच्चासन पर विराजित करने के लिये वचनबद्ध हो जाएं ।
वन्दे मातरम्.. वन्दे मातरम्…
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्..
सस्यश्यामलां मातरम्.. वन्दे मातरम्
मैं उस भारतमात को प्रणाम करता हूं..
जो जलसंपदा से संपन्न है, फल-फूलों से सुशोभित है, मलयपर्वत से होकर बहनेवाली वायु के सुखस्पर्श से जो शीतल है..
जो नई नई फसल से श्यामल प्रतीत होती है.. उस मात अको प्रणाम !
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्.. वन्दे मातरम् ..१
जिसकी रात्रियां चंद्रमा के शुभ्र तेज से रोमांचित है,
खिले हुए फूलों से सजी वृक्षों की डालियों से जो सुशोभित है,
जो मंद मधुर स्मितहास्य कर रही है, जो मधुर वचनों से युक्त है,
उस सुखदात्री, वरदात्री माता को प्रणाम !
कोटिकोटिकण्ठ-कलकलनिनादकराले
कोटिकोटिभुजैर्धृत-खरकरवाले
अबला केन मा एत बले
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीं मातरम्.. वन्दे मातरम्.. ..२
जो कोटि कोटि कंठों से उद्घोषित नाद के कारण भीषण प्रतीत हो रही है,
जिसने अपनी संतानों की कोटि कोटि भुजाओं के माध्यम से तीखे खड्गों को धारण किया है,
वह मां अबला कैसे हो सकती है ?
वह तो अपार बल रखनेवाली है ! उस तारिणी को प्रणाम !
शत्रुओं का संहार करनेवाली मां को प्रणाम !
तुमि विद्या तुमि धर्म तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणा: शरीरे बाहुते तुमि मा शक्ति
हृदये तुमि मा भक्ति
तोमारई प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम्.. वन्दे मातरम् ..३
तुम विद्या हो, तुम धर्म हो तुम हृदय में विराजित हो, तुम सभी शास्त्रों का मर्म हो !
तुम ही हमारे देह में बसनेवाले प्राण हो, तुम ही भुजाओं में बसनेवाला बल हो !
हृदय में खिलनेवाली भक्ति भी तुम ही हो !
हर मंदिर में तुम्हारी ही मूर्ति विराजित है !.. मां तुम्हें प्रणाम !
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम्.. वन्दे मातरम् ..४
तुम ही दसों भुजाओं में शस्त्र धारण करनेवाली मां दुर्गा हो !
तुम ही कमलपुष्प में विराजमान मां लक्ष्मी हो !
तुम ही विद्या देनेवाली मां सरस्वती हो ! तुम्हें प्रणाम !
उस कमला को प्रणाम, जो निर्मल एवं अतुलनीय है,
जल से समृद्ध, फल-फूलों से संपन्न उस माता को प्रणाम..
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां
धरणीं भरणीं मातरम्.. वन्दे मातरम्… ..५
जो सांवले रंग की है, सरल है, मंद मंद मुस्कुरानेवाली है, सजी-धजी हुई है,
जो धरतीमाता अपनी संतानों का भरण-पोषण करनेवाली है, उस माता को प्रणाम !