“साधना का अंतिम परिणाम सेवा है”
“गीता पढ़ें, पढ़ाएँ, जीवन में लाए।” परम पूज्य स्वामीजी के इस दिव्य ध्येय-वाक्य को साकार करने हेतु हम श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन तो आरम्भ कर चुके हैं, परन्तु साधना तब पूर्ण होती है जब उसमें सेवा का समावेश हो। सेवा ही वह सेतु है, जो आत्मकल्याण और लोकमंगल को जोड़ती है।साधना का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करना नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सेवा यज्ञ है, जिसमें समय, कौशल और निष्ठा के साथ विभिन्न प्रकार से योगदान संभव है।
इसिलिये स्वामीजी कहते है साधना का अंतिम परिणाम सेवा है .
इसी उद्देश्य से Learn Geeta द्वारा “आओ, गीता-सेवी बनें” नामक विशेष कार्यक्रम का आयोजन प्रति माह किया जाता है।इस सेवा-प्रेरणा कार्यक्रम का उद्देश्य है – साधकों को विभिन्न सेवा-विभागों से परिचित कराना, जिससे वे अपनी रुचि एवं योग्यता के अनुसार सेवा का संकल्प लें।यह विभाग साधक से सेवक की पावन यात्रा का पथ प्रशस्त करता है।
फरवरी 2021 में, आदरणीय अशुभैया गोयल जी और आदरणीय संजय भैया मालपानी जी के मार्गदर्शन तथा स्वामीजी के आशीर्वाद से, 8 विभागों और हिंदी भाषा में कार्यक्रम आरम्भ हुआ। धीरे-धीरे यह 11 विभागों तक विस्तृत हुआ। अगस्त 2024 में अंग्रेजी भाषा जुड़ी और मई 2025 से कन्नड़, तेलुगु और बांग्ला भाषाओं को सम्मिलित किया गया। आज यह कार्यक्रम 11 विभागों और 5 भाषाओं में सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है।
- प्रमुख गतिविधियाँ
- प्रतिनिधियों का चयन – प्रत्येक विभाग के लिए समन्वयक नियुक्त होते हैं, जो हिंदी और अंग्रेजी (तथा अन्य भाषाओं) के प्रतिनिधियों का चयन करते हैं।
- स्क्रिप्ट निर्माण – संपादकीय टीम सेवा से जुड़ने की प्रक्रिया, आवश्यक योग्यता, उत्तरदायित्व आदि को सम्मिलित कर स्क्रिप्ट तैयार करती है।
- वीडियो रिकॉर्डिंग – प्रतिनिधि अपनी स्क्रिप्ट का वीडियो रिकॉर्ड करवाते हैं, जिसे रिकॉर्डिंग टीम सेवा-भाव से तैयार करती है।
- सूत्रसंचालन और प्रश्न-उत्तर – कार्यक्रम के अंतिम पड़ाव में सूत्रसंचालक सभी पक्षों को जोड़ते हैं और वरिष्ठ कार्यकर्ता साधकों के प्रश्नों का समाधान करते हैं।
- प्रभाव
इस कार्यक्रम का परिणाम अद्भुत है। जो यात्रा मात्र 100 सेवकों से शुरू हुई थी, वह आज 14,000+ सेवकों के विराट सेवा- सेना में बदल चुकी है। विशेष बात यह है कि लर्न गीता संथा वर्ग इन्ही सेवकों से चलती हैं। इसमें कोई भी वेतनभोगी कर्मचारी नहीं है। यह सेवा यज्ञ साधकों को आत्मिक शुद्धि और ईश्वर-समर्पण की अनुभूति कराता है।
“य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥”
श्रीमद्भगवद्गीता (18.68)
यदि आप भी इस सेवा-यज्ञ में सहभागी बनकर, गीता का दिव्य संदेश जन-जन तक पहुँचाना चाहते हैं,तो आज ही
सेवा हेतु पावन संकल्प लें और फॉर्म भरें sewa.learngeeta.com
