
लर्नगीता ऑनलाइन संथा वर्गों का बीजारोपण जून (२०२०) दो हज़ार बीस में हुआ । यह बीज गर्भावस्था से निकलकर पूर्ण प्रस्फुटित होकर एक हरा भरा नन्हा सा पौधा बन गया , उसमें कोंपलें फूटीं और देखते ही देखते वह पॉंच वर्ष का शिशु बन गया ।
इन पॉंच वर्षों में इस नन्हें का विकास हुआ व शनैः शनैः उसमें अनेक शाखायें विकसित हुईं । अनेक सेवी व अनेक विभागों के फल इन शाखाओं पर फलीभूत हुए । सर्वाधिक शैक्षणिक योगदान जिन गतिविधियों द्वारा प्राप्त हुआ उनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं
१) कण्ठस्थीकरण वर्ग
२) व्याकरण कक्षायें
३) अतिरिक्त कक्षायें
कण्ठस्थीकरण कक्षायें
श्रीमद्भगवद्गीता एक मंत्रमयी भगवद् वाणी है और भगवद् वाणी का प्रसार दैवी शक्तियॉं करती हैं ।ये शक्तियॉं हमारा मानसिक संतुलन बनाये रखती हैं। गीताजी के मनन , पठन व चिंतन से जीवन में समत्व आता है , जिसे योग कहते हैं ।मनन, चिन्तन तभी सम्भव होगा जब गीताजी मुखोद्गत होंगी , कण्ठ मे , वाणी मे विराजमान होगी । वाणी मे विराजित करने के लिये गीताजी को कण्ठस्थ करना अनिवार्य है, और इस अनिवार्यता की पूर्ती करने के लिये गीता परिवार का उत्तम उपक्रम है कण्ठस्थीकरण कक्षायें ।
कण्ठस्थीकरण कक्षाओं का प्रारम्भ मार्च 2024 को हुआ । कण्ठस्थीकरण कक्षाओं की रूपरेखा गीता परिवार द्वारा ली जाने वाली चारस्तरीय परीक्षाओं के पाठयक्रमानुसार तैयार की गयी हैं जो मनोविज्ञान के शिक्षण सूत्र ( Maxims of learning) ( सरलता से जटिलता की ओर , From Simple to Complex) इस सूत्र पर आधारित है । पहले सरल , सुलभ कम श्लोकों वाले फिर गहन अधिक श्लोकों वाले अध्यायों को बढते स्तरों मे समावेशित किया है । जटिलता यदि आरम्भ में ही आ जाये तो तो साधक अपना आत्मविश्वास खो देंगे , इसिलिए सम्पूर्ण अठारह अध्यायों का वितरण चार स्तरों मे किया है
यह एक सामूहिक प्रकल्प है । जिसमें अन्य नियमित कक्षाओं की तरह ही तकनिकी सहायक , समूह समन्वयक , गट सहायक सेवायें देते हैं । अन्य ऑनलाइन कक्षाओं कीतरह जिज्ञासू व पाठक कक्षायें भी झूम प्रांगण में सप्ताह में पॉंच दिन चालीस मिनिट के निर्धारित समय में होती हैं ।पथिक व व्रती की क क्षायें सप्ताह मे तीन दिन सोमवार , बुधवार व शुक्रवार को सम्पन्न होती हैं
हमारे सक्षम गुरुजन अतिरिक्त कक्षायें लेकर सारा पाठ्यक्रम कंठस्थ करवाते हैं । पहले चरणानुसार , फिर दो चरण जोड़कर व अंत मे सारे मिलकर स्वयम् श्लोक गाते हैं । पहले दस मिनट आवृत्ति फिर बाद में उपर्युक्त विधीनुसार व अंत में परीक्षा पद्धति पर आधारित एकल गान किया जाता है ।
परीक्षाओं के पहले संक्षिप्त में परीक्षा विधी के लिये मार्गदर्शन दिया जाता है ।
स्वयम् ही अध्ययन कर सकें इसिलिये मार्गदर्शिका भी प्रदान की जाती है ।
कण्ठस्थीकरण के पश्चात् गीताजी आजीवन हमारे साथ रहती हैं, व जीवन मे सकारात्मकता लाकर जीवन को मधुबन बनाती हैं क्योंकि ——-
गीता सुगीता कर्तव्या , किमन्यैः(ख्) शास्त्र विस्तरैः ।
या स्वयं( म्) पद्मनाभस्य , मुखपद्माद्विनिःसृता ॥
श्रद्धेय स्वामीजी कहते हैं
१)Chanting of pure and correct pronunciation changes the vibrations of brain cell’s programming.”
२) प्राचीन काल मे वैदिक साधक प्रातःकाल में वेद पठन कर कण्ठस्थिकरण करते थे , जिससे उनकी स्मृती तीव्र व जाज्वल्यमान रहती थी ।
३)इंग्लंड के एक अनुसंधान कारी के मतानुसार संस्कृत भाषा के श्लोकों के पठन के समय जिह्वा की हलचल होती है, जिह्वा कई तरह से घूमती है , जिससे मस्तिष्क की पेशियों की क्षमता बढती है।
कारण …..
जिस प्रकार ऑक्युप्रेशरिस्ट विभिन्न दाबविन्दुओं ( pressure points )पर दाब देकर व्याधि का पता लगाकर चिकित्सा करते हैं , ठीक वैसे ही संस्कृत के उच्चारण के समय जिह्वा पर स्थित दाबबिन्दुओं पर दबाव आने से मस्तिष्क की पेशियों का उद्दीपन होता है , जो स्मरणशक्ति तीव्र करने में सहायक होता है ।
४) हम जब वाचन करते हैं , कभी कभी दृष्टी तो पन्नों पर होती है लेकिन , मन कहीं और होता है , मन को भटकने के लिये वीसा या पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती , लेकिन कण्ठस्थिकरण से एकाग्रता मे वृद्धि होती है
५)गीताजी में कृष्णार्जुन संवाद है , कृष्ण भगवान् अर्जुन से बहुत प्रेम करते हैं , वे कहते हैं——-
सर्वगुह्यतमं(म्) भूयः(स्), श्रृणु मे परमं(वँ) वचः।
इष्टोऽसि में दृढमिति, ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
गीताजी के श्लोकों के कण्ठस्थिकरण के समय आप अपने आप को अर्जुन के स्थान पर रखें , आप भी भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम को अनुभव करेंगे ।
आदरणीय आशू भैया द्वारा शुभारम्भ प्रसंग पर किये वक्तव्यानुसार-
गीताजी जब ग्रंथ से कण्ठ में आ जायें तो वह अपनी हो जाती है । निद्रावस्था मे भी वह मस्तिष्क मे रहती है , वह जन्मजन्मांतर तक साथ रहती है ।
पॉंच वर्ष का बालक माता की गोद मे बैठकर श्लोकों का प्रात्यक्षिक देता है , तब वह इस जन्म के ही नहीं पूर्व जन्म के भी पुण्यकर्म वहन करता है ।आज का कण्ठस्थीकरण हमें अगले जन्म मे अवश्य ही किसी उच्च श्रेणी की आत्मा मे जन्म लेने मे सहायक होगा ।
व्याकरण कक्षायें
परमात्मा एक शक्ति है, इस अगाध शक्ति तक शक्ति के ही माध्यम से पहुँचने की आवश्यकता होती है और वह शक्ति है ध्वनी ऊर्जा । ज्ञान का आदान प्रदान संवाद के माध्यम से मानव मात्र को छोड़कर अन्य किसी भी प्राणी में नहीं पाया जाता । संवाद व उच्चारण के लिये भाषा की आवश्यकता होती है ।
भाषा क्या है ?
भाषा अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है।
अभिव्यक्ति भाषा व प्रतिकों से की जाती । भाषा की सबसे छोटी इकाई वर्ण है । ध्वनियों की वैविध्यता व परिवर्तन विभिन्न वर्णों को जन्म देती है ।
वर्ण क्या है ?
जो ध्वनी हमारे मुख से प्रक्षेपित होती है उस ध्वनी का लिपिबद्ध किया हुआ रुप वर्ण है ।
मन्त्रोच्चारण करते समय हम ध्वनी के सम्पर्क में आते हैं । प्रकाश जो ऊर्जा का ही एक प्रकार है उसे हम बिना किसी उपकरण के उत्पन्न नही कर सकते लेकिन ध्वनियों को उत्पन्न करने केलिये किसी भी उपकरण की आवश्यकता नही होती । हमारी मुखगुहा में ईश्वर प्रदत्त उपकरण विद्यमान हैं , जिनकी सहायता से हम विविध ध्वनियॉं उत्पन्न कर सकते हैं । हमारी जिह्वा मुखगुहा के जिस भाग को स्पर्श कर उच्चारण करती है वहीं से ध्वनी का उद्गम् होकर वर्णों की उत्पत्ति होती है । उदगम् के स्थानानुसार स्पर्शीय वर्णों का वर्गीकरण कण्ठ्य , तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य व ओष्ठ्य इन पॉंच वर्गों में किया गया है । देवनागरी वर्णमाला में वर्णों के उच्चारण के लिये जिन अंगों का उपयोग होता है वह निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट होता है ।
अष्टौ स्थानानि वर्णमुरःकण्ठःशिरस्तथा । जिह्वामूलम् च दन्ताश्च च नासिकौष्ठौ च तालु च॥
इन सारे अंगों से उच्चारित होने वाले वर्णों का उपयोग हमारे भावों के आदान प्रदान के लिये संवादों के माध्यम से होता है जिसे हम भाषा कहते हैं ।
व्याकरण क्या है ?
भाषा का व्यवहार सुचारु रूप से चले इसिलिये कुछ नियम बनाये गये , इन्हीं नियमों का नामकरण व्याकरण है ।
क्+ऋ= कृ ( व्यंजन् + स्वर = अक्षर )
यह जो अक्षर बना , इसका शास्त्र जानना इसे व्याकरण कहते हैं ।
पतंजली मुनी ने इसे शब्दानुशासन नाम दिया ।
“ भाषा के आदान प्रदान के लिये जिन नियमों का पालन करते हैं उसे शब्दानुशासन कहा जाता है “।
गीता परिवार द्वारा गीता के श्लोकों का सही उपचारण करने हेतू अनुस्वार , आघात व विसर्गों के सही उच्चार समझने हेतू, ,सरल पठनीय श्रीमद्भगवद्गीता का प्रकाशन हुआ ।
प्रारम्भ में नदी का मुहाना एक पतली रेखा की तरह होता है लेकिन आगे पथ पर चलते चलते जैसे नदी विस्तार प्राप्त करती है और अंतिम लक्ष्य सागर होता है , ठीक वैसे ही यह गीता कक्षायें अब शैशवावस्था से किशोरावस्था की ओर बढ रही हैं और इस अवस्था को और बलवान, सुदृढ करने हेतू गीता परिवार मे व्याकरण को भी जानना आवश्यक समझा।
हमारे व्याकरण विदों ने इस ज्ञान गंगा को हम तक पहुँचा दिया है , इसके भँवर में हम समा गये हैं , अब तो पूर्ण रूप से ज्ञान से सराबोर होकर हम सभी अनुस्वार , विसर्ग , आघात , दीर्घ , ह्रस्व व हलंत वर्ण , संयुक्त , पूर्ण व अर्ध वर्णों की नवसूत्री द्वारा भगवद्गीताजी को जन जन तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं । यह हम सभी साधकों के जीवन का ऐसा मील का पत्थर है जो हमारी इहलोक की यात्रा का दिशादर्शक है ।
मूल संहिता पाठ पर आधारित भगवद्गीता को चरणानुसार पाणिनीय व्याकरण के आवश्यक नियमों का समावेश कर श्रीमद्भगवद्गीता को आबाल वृद्धों तक पहुँचाने में सरल पठनीय गीता व व्याकरण कक्षायें एक महत्वपूर्ण योगदान दे रहीं हैं।
समय समय पर सारे व्याकरण नियमों का समावेश कर कक्षाओं का संचालन साधकों के शुद्ध उच्चारण में सहायक है । साधकों के उच्चारण दिन प्रतिदिन शुद्ध होते जा रहे हैं । जिन संस्कृत के श्लोकों को कठिन समझकर मानव , मात्र गीताजी को स्पर्श कर छोड़ देते थे ,आज वही इन व्याकरण नियमों का अध्ययन कर सरलता से गीताजी का अध्ययन कर रहे हैं। संधी व संधी विच्छेद के नियम , मूल अर्थ को स्थिर रखकर उच्चारण शुद्ध करने में अती सहायक सिद्ध हुये हैं ।
चारों स्तरों के साधकों के लिये ग्यारह भाषाओं मे अलग अलग व्याकरण कक्षाओं का संचालन किया जाता है ।
व्याकरण कक्षायें व प्रशिक्षक
सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन् के मतानुसार
No teacher can teach until he or she is learning by himself , no lamp can light another lamp until it continues to burn its own flame “ 🔥.
“Teaching is self learning “
आजीवन साधना करना ज्ञान प्राप्ती के लिये अती आवश्यक है , अतएव सर्व प्रशिक्षकों को आवश्यक नियमों जैसे चरणों का पृथक्करण , आघात , अनुस्वार , विसर्ग ,संधी व संधी विच्छेद के नियमों से अवगत कराने के लिये , विशेष व्याकरण कक्षाओं का आयोजन किया गया , जिससे सारे शिक्षक प्रशिक्षित होकर पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कक्षाये संचालित कर रहे हैं । प्रशिक्षकों के ज्ञानार्जन से सारे साधक भी लाभान्वित हुये । गीताध्ययन रोचक , सुलभ व भावपूर्ण हो गया ।
धन्यवाद सारे संचालक , व्याकरण विद् व प्रशिक्षक व अंत में साधक , जिनकी बढ़ती उपस्थिति हमारा उत्साह वर्धन कर , हमारा आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त कर रही है ।
अतिरिक्त कक्षाएँ
अतिरिक्त कक्षाएँ क्या हैं ?
१) वह उपक्रम या संथा वर्ग ,जो निर्धारित समय के बाद अतिरिक्त अधिक समय देकर किया जाता है , जिससे उत्तम विद्यार्थी और परीक्षार्थी तयार हो, उसे अतिरिक्त कक्षा कहते हैं ।
२) शुद्ध उच्चारण के साथ साधकों द्वारा श्लोकों से संबंधित विषय या पाठ्यक्रम को पूर्णरूप से समझने के लिये आयोजित की जाने वाली कक्षायें अतिरिक्त कक्षाएँ कहलाती हैं ।
अतिरिक्त कक्षाओं के क्या उद्देश्य हैं ?
अतिरिक्त कक्षाओं के तीन मुख्य उद्देश्य हैं ।
१) किसी अपरिहार्य कारण से छुटे हुये पाठ्यक्रम की पूर्ती करने के लिये , उस भाग को जानना, समझना ।
२) परीक्षा की उत्तम पूर्व तयारी करवाना
३) साधकों के कंठस्थीकरण प्रदर्शन को सुधारकर परीक्षा पद्धति से अवगत कराना
अतिरिक्त कक्षाओं का संचालन कैसे होता है?
परीक्षा की पूर्ण तयारी के लिये , विभिन्न स्तरों पर आवश्यक अध्यायों का अध्ययन इन कक्षाओं में किया जाता है।
चारों स्तरों की परीक्षाओं के लिये कण्ठस्थिकरण करवाकर परीक्षा पद्धति की जानकारी दी जाती है ।
प्रत्येक स्तर की परीक्षा मे समावेशित अध्यायों की (Mock test ) अभ्यासिक परिक्षण करवाया जाता है ।
परीक्षा के नाम व सम्मिलित अध्याय
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परीक्षा समावेशित अध्याय
१) जिज्ञासु १२,१५,१६.
२) पाठक. ९,१२,१४,१५,१६,१७
३) पथिक. उपर्युक्त + १,३,४,५,६,७
४) गीताव्रती सम्पूर्ण अठारह अध्याय
मॉक टेस्ट साधकों की पूर्व तैयारी का मूल्यांकन कराने में सहायक होता है । साधकों की समस्याओं का समाधान उनके आत्मविश्वास में वृद्धि करता है .
सारी समस्याओं का समाधान हो जाने पर साधक खुशी खुशी बढ़े हुये मनोबल के साथ परीक्षा युद्ध के लिये झूम प्रांगण में उतरते हैं , और विजयश्री प्राप्त करते हैं ।
शैक्षणिक व सांस्कृतिक उत्कृष्टता का इससे अच्छा प्रावधान और कोई हो ही नहीं सकता ।
🙏🙏जयश्री कृष्ण 🙏🙏