“संयम, साधना और भगवद स्मरण — यही हैं जीवन की सच्ची दिशा। एकादशी का दिन, इन तीनों का पावन संगम है।” एकादशी, भारतीय संस्कृति में केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मसाधना का विशेष अवसर है। यह दिन हमें जीवन की गति को विराम देकर अंतर की ओर लौटने का निमंत्रण देता है। आज से 40 वर्ष पूर्व, परम पूज्य स्वामी श्री गोविंददेवगिरिजी महाराज ने श्रीमद्भगवद्गीता के प्रचार-प्रसार का बीड़ा उठाया। उनका मूलमंत्र था — “घर-घर गीता, हर-कर गीता” — अर्थात हर घर में गीता का वास हो और हर कर्म में गीता का प्रकाश।
इस संकल्प को मूर्त रूप देने के लिए गीता परिवार ने प्रत्येक एकादशी के पावन दिन गीता चिंतनिका सत्र का आयोजन प्रारंभ किया गया — यह एक ऐसा सत्र जो केवल पाठ नहीं, भगवद चिंतन और आत्मबोध की यात्रा को गति देता है।
“चिंतनिका” का भाव
“चिंतनिका” अर्थात चिंतन की कणिका।
जैसे बीज में वटवृक्ष छिपा होता है, वैसे ही गीता के प्रत्येक श्लोक बीज रूप में हैं। जब उनका गहन चिंतन किया जाता है तो वे ज्ञान, भक्ति और जीवनमार्ग के विराट स्वरूप में प्रस्फुटित होते हैं। इसीलिए चिंतनिका सत्र का उद्देश्य केवल पठन ही नहीं, बल्कि गीता श्लोकों के बीज को जीवन में फलित-फूलित करना है। चिंतनिका सत्र का प्रमुख उद्देश्य है —गीता जी का शुद्ध पठन, ज्ञानपूर्ण चिंतन और उसे जीवन में उतारने की प्रेरणा देना। यह सत्र प्रतिमाह एकादशी को ज़ूम मंच पर रात्रि 9:00 से 10:00 बजे तक होता है।
सत्र की संरचना
– श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों को 6 खंडों में विभाजित किया जाता है।
– प्रत्येक एकादशी को 3 अध्यायों का पठन एवं उन पर क्रमशः चिंतन होता है।
– एक संपूर्ण पारायण तीन माह की अवधि में पूर्ण होता है।
– विशेषता यह है कि इसमें सेवा देने वाले साधक प्रायः गीताव्रती होते हैं — अर्थात जिन्होंने गीता संपूर्ण कंठस्थ कर परीक्षा द्वारा यह उपाधि अर्जित की है।
सत्र की रूपरेखा
सत्र का प्रारंभ मंगलमय प्रार्थना एवं दीप प्रज्वलन से होता है। तत्पश्चात क्रमशः तीन अध्यायों का पठन व चिंतन किया जाता है, जिनमें से एक अध्याय का चिंतन प्रादेशिक भाषा में भी प्रस्तुत होता है। अंत में धन्यवाद ज्ञापन और आरती के साथ सत्र संपन्न होता है।
प्रत्येक पारायण के आरंभ से पूर्व गीताव्रतियों की बैठक लेकर सभी 18 अध्यायों के पठन व चिंतनकर्ताओं की सूची तैयार की जाती है। उनके द्वारा समय रहते ऑडियो व स्क्रिप्ट भेजे जाते हैं, जिनका संशोधन व रिकॉर्डिंग कर सत्र सुनिश्चित रूप से संपन्न किया जाता है।
विशेष अवसर
– पारायण के प्रथम सत्र में स्वागत भाषण श्री आशुजी गोयल अथवा श्री हरिनारायणजी द्वारा दिया जाता है।
– अंतिम सत्र में दिव्य आरती होती है, जिसमें सभी दीप प्रज्वलनकर्ता साधकों को आमंत्रित किया जाता है।
सहभागिता और विस्तार
– प्रत्येक सत्र में लगभग 10-11 गीताव्रती साधक सेवा देते हैं।
– विविध क्षेत्रों की टीमें इस आयोजन को सुव्यवस्थित बनाती हैं।
– व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से समय पर जानकारी और सूची साझा की जाती है।
– आज इन सत्रों से लगभग 1000 साधक ऑनलाइन जुड़कर पठन-चिंतन का अमृत पान करते हैं।
– वर्तमान में सप्तदश (17वाँ) पारायण का पठन एवं चिंतन जारी है।
सभी साधक इस अवसर को परम सौभाग्य मानते हैं कि उन्हें प्रत्येक एकादशी को गीता के अध्यायों के पठन और चिंतन श्रवण का अवसर मिलता है। अंततः यही प्रार्थना — “भगवान श्रीकृष्ण अपनी कृपा से हमें सदैव सत्य के मार्ग पर अग्रसर रखें और गीता के संदेश को जीवन में जीने की शक्ति दें।”
✨ गीता पढ़ें, पढ़ाएँ, जीवन में लाएँ। ✨