गीता विशारद डॉ. संजय मालपाणी
राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष, गीता परिवार
जीवन विजय के मंत्र
गीता का मूल उद्देश्य अर्जुन को विजयी बनाना यह था। भगवान ने इस उपदेश में अर्जुन के विजय के अनेक सूत्र दिये। भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षण क्या हैं? भगवान के उत्तर केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए विजय के मार्गदर्शक हैं।
यदि हम इन शिक्षाओं को अपने जीवन में उतार लें, तो कोई भी परिस्थिति हमें हरा नहीं सकती।
चित्त की प्रसन्नता
जो व्यक्ति भीतर से आनंदित है, उसकी प्रसन्नता परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती। यही स्थायी सफलता का रहस्य है।
क्रोध पर विजय
क्रोध विवेक का नाश करता है। क्रोध पर विजय पाना आत्मविजय का प्रथम सोपान है।
समभाव
सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय—सबमें समान रहने वाला ही सच्चा विजेता होता है।
इंद्रिय संयमन
इंद्रियों को वश में रखकर ही ऊर्जा और समय का सदुपयोग होता है। यही विजयी जीवन की कुंजी है।
रसना पर विजय
रसना (जिह्वा) सबसे चंचल इंद्रिय है। अति-भोजन और स्वाद की आसक्ति मनुष्य को दुर्बल बनाती है। रसना पर विजय पाना न केवल स्वास्थ्य का आधार है, बल्कि आत्मसंयम और आत्मबल की पहचान भी है।
सतर्कता व सजगता
स्थितप्रज्ञ सदैव जागरूक रहता है। उसकी सतर्कता उसे हर परिस्थिति में सही मार्ग चुनने में समर्थ बनाती है।
भगवान का सदैव स्मरण
ईश्वर का स्मरण जीवन को संबल देता है और हर संघर्ष में विजय की शक्ति देता है।
कामनाओं का त्याग
कामनाएँ जितनी बढ़ती हैं, उतना ही मन अशांत होता है। त्याग से ही मन हल्का और विजयी बनता है।
राग-द्वेष से मुक्ति
अत्यधिक आसक्ति और घृणा दोनों ही मन को बाँधते हैं। इनसे मुक्त होकर ही मनुष्य स्वतंत्रता और विजय प्राप्त करता है।
बुद्धि की स्थिरता
अस्थिर बुद्धि निर्णय को डगमगाती है। स्थिर बुद्धि वाला ही सच्चा विजेता कहलाता है।
इन सभी लक्षणों का सार यही है कि बाहरी सफलता से पहले भीतरी विजय आवश्यक है। जो अपने मन और इंद्रियों पर विजय पा लेता है, उसके लिए बाहरी विजय सहज हो जाती है।
– डॉ. संजय मालपाणी