महाकुंभ प्रयागराज 2025 में गीता महायज्ञ, गीता मैत्री मिलन एवं गीता भक्ति दिवस
“जहाँ गीता है, वहाँ जीवन है। जहाँ वेद हैं, वहाँ भारत की आत्मा है।”
✨ महाकुंभ: भारत की आध्यात्मिक चेतना का महासंगम
‘कुंभ’ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति का अमृत स्रोत है। समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कलश की स्मृति में आयोजित यह महोत्सव, हर बारह वर्षों में चार तीर्थों—प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक—में होता है। परंतु महाकुंभ का आयोजन 144 वर्षों में एक बार होता है और यह युग का दुर्लभतम सौभाग्य है कि हम इस दिव्य अवसर के साक्षी बने।
प्रयागराज की त्रिवेणी संगम भूमि पर, जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती मिलती हैं, वहाँ इस बार केवल जल का संगम नहीं हुआ—बल्कि ज्ञान, भक्ति और कर्म की त्रिवेणी भी प्रवाहित हुई।
🌺 गीता परिवार का विराट महायज्ञ
पूज्य स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के प्रेरणास्पद ध्येय वाक्य—“गीता पढ़ें, पढ़ाएँ, जीवन में लाएँ”—को साकार करते हुए गीता परिवार ने 20 जनवरी से 12 फरवरी 2025 तक गीता प्रचार का अभूतपूर्व अभियान चलाया।
2.5 लाख पत्रक, 1000 बैनर, 400 होर्डिंग्स के माध्यम से गीता का संदेश जन-जन तक पहुँचा। त्रिवेणी संगम पर गूंजते गीता श्लोक और हर-हर महादेव के उद्घोष ने वातावरण को दैवी ऊर्जा से भर दिया। नागा साधुओं, संत मंडलियों, गृहस्थ श्रद्धालुओं—सभी ने गीता के अमृत को श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया।
यह केवल प्रचार नहीं था, बल्कि आत्ममंथन, धर्मस्थापना और जीवन के पुनर्जागरण का महायज्ञ था।
🌟 19वाँ गीता मैत्री मिलन – कार्ष्णि पीठ, प्रयागराज
महाकुंभ के पुण्यकाल में कार्ष्णि पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी श्री गुरुशरणानंद जी महाराज एवं पूज्य स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज के सान्निध्य में 19वाँ गीता मैत्री मिलन अत्यंत भव्य, भावपूर्ण एवं दिव्य रूप में संपन्न हुआ।
संगीतमय गीता पारायण में आ. पूजा गोयल भाभी जी एवं आ. ज्योति शुक्ला दीदी ने भक्ति स्वर लहरियाँ बिखेरीं। गीता पोथी यात्रा में स्वयं पूज्य स्वामी जी की सहभागिता रही। दीप प्रज्वलन और गीता आरती ने सम्पूर्ण वातावरण को दिव्यता से आलोकित किया।
गुजरात से आए 14 वर्षीय ध्रुव जोशी और 8 वर्षीय मैत्रयी जोशी को पूज्य स्वामी जी ने “गीता का कंप्यूटर” और “भविष्य की आशा की किरणें” कहकर सम्मानित किया।
नागपुर के निष्ठावान साधक श्री पुंडलिक जी रामदासानी द्वारा संकलित नित्यपाठ पुस्तिका का विमोचन हुआ, जो साधकों के लिए एक अमूल्य आध्यात्मिक निधि सिद्ध हुई।
सम्पूर्ण कार्यक्रम का युगल संचालन अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. आशू गोयल भैया एवं राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. संजय मालपाणी भैया ने अपनी गरिमामय वाणी और प्रेरक शैली से किया। उनके संचालन ने सभा को ऊर्जा, अनुशासन और भक्ति का अद्वितीय संगम प्रदान किया। आयोजन का समापन संतों, साधकों एवं समर्पित कार्यकर्ताओं के भावपूर्ण सम्मान के साथ हुआ। आ. रूपल शुक्ला दीदी एवं आ. कविता वर्मा दीदी की कोमल वाणी में गुंजित समापन प्रार्थना ने वातावरण को भक्ति, कृतज्ञता और आनन्द से भर दिया।
इस महोत्सव में प्रयागराज ही नहीं, अपितु देश-विदेश से गीता व्रती, प्रचारक एवं साधक पधारे। विशेष सहयोगी रहे मुंबई से पधारे श्री सुधांशु अग्रवाल जी, श्री अभय भुतड़ा जी, श्री संजय भुतड़ा जी एवं उनका समर्पित परिवार, जिनकी आस्था और सेवा ने इस पर्व को और गरिमा प्रदान की। यह आयोजन केवल स्मरणीय नहीं, वरन् आत्मा के जागरण, संगठन के समर्पण और संतों के सान्निध्य में जीवन के पुनर्जन्म का साक्षात् पर्व बन गया।
🎉 गीता भक्ति दिवस – पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज का 76वाँ जन्मोत्सव
गीता भक्ति दिवस पर परम पूज्य स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरि जी महाराज का 76वाँ जन्मोत्सव अपने आप में साक्षात् त्रिवेणी संगम बन गया—जहाँ भारतीय तिथि और ग्रेगोरियन दिनांक का अद्वितीय संगम, महाकुंभ का पावन अवसर और प्रयागराज की पुण्यधारा एक साथ जुड़ गए।
पिछला 75वाँ जन्मोत्सव पुणे के आलंदी तीर्थ क्षेत्र में भव्य अमृत महोत्सव के रूप में मनाया गया था। परंतु उसके दिव्य समापन को और अधिक आलोकित करने के लिए, इस बार प्रयागराज की पावन कुंभ स्थली को चुना गया—ताकि गीता भक्ति दिवस की दिव्यता निरंतर प्रवाहित और विस्तारित होती रहे।
पूज्य स्वामी जी का व्यक्तित्व भारतीय वेद–परंपरा के उत्थान का अमिट दीपस्तंभ है। जिन 1100 वेद शाखाओं का कभी भारत भूमि पर प्रकाश था, उनमें से आज केवल 11 शाखाएँ बची हैं। इन्हें जीवित रखने हेतु स्वामी जी ने प्रण लिया है और देशभर में 40 वेद विद्यालयों के माध्यम से 1880 बालकों को निःशुल्क वेदाध्ययन की सुविधा प्रदान कर रहे हैं। स्वामी जी को यथार्थ में चलते–फिरते विश्वविद्यालय कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इस पावन अवसर पर अनेक संत-महात्माओं की उपस्थिति रही। कार्ष्णि पीठाधीश्वर स्वामी श्री गुरुशरणानंद जी महाराज ने अपने करकमलों से पावन अभिमंत्रित जल द्वारा पूज्य स्वामी जी का अभिषेक किया। सभी संतों ने मंगलगीत और मंगलाचरण के साथ पूज्य स्वामी जी का अभिनंदन किया।
गीता भक्ति दिवस के इस पुण्य दिन, स्वामी जी के जीवन–परिचय पर आधारित एक विशेष ग्रंथ का विमोचन संतों की साक्षी में सम्पन्न हुआ। यह ग्रंथ उनके जीवन के विविध आयामों और समाजसेवा की अनुपम गाथा का साक्षी बनेगा।
🌿 संत-साधु एवं समाजसेवियों की दिव्य उपस्थिति
इस महोत्सव की गरिमा को दिव्यता और प्रताप प्रदान करने वाले अनेक संत, आचार्य एवं राष्ट्रसेवक उपस्थित रहे, जिनमें प्रमुख रूप से निम्न विभूतियाँ सम्मिलित थीं—
परम श्रद्धेय पूज्य स्वामी श्री गुरुशरणानंद जी महाराज कार्ष्णि पीठाधीश्वर, वृन्दावन
पूज्य गीता महर्षि स्वामी श्री ज्ञानानंद जी महाराज प्रख्यात गीता वक्ता एवं आध्यात्मिक विचारक
पूज्य स्वामी श्री विश्वेश्वरानंद जी महाराज वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड एवं सन्यास आश्रम, मुंबई
पूज्य मुनि श्री भद्रेश स्वामी जी एवं पूज्य मुनि श्री वात्सल स्वामी जी स्वामीनारायण संप्रदाय, अहमदाबाद
पूज्य मुनि श्री लोकेश कुमार जी जैन परंपरा के प्रतिष्ठित संत
श्रद्धेय स्वामी श्री हृदयानंद जी महाराज जम्मू से पधारे दिव्य संत
श्रद्धेय स्वामी श्री राजेंद्रदास जी महाराज जाकेलाधाम, हरियाणा
परम् आदरणीय श्री सुरेश ‘भैय्याजी’ जोशी जी पूर्व सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
आदरणीय श्री कृष्णगोपाल जी सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
आदरणीय डॉ. दिनेश जी सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
आदरणीय श्री रामलाल जी अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
आदरणीय श्री रमेश जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रयागराज के वरिष्ठ कार्यकर्ता
इन सभी विभूतियों की साक्षी और सहभागिता ने इस जन्मोत्सव को केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और राष्ट्र चेतना का दिव्य संगम बना दिया।
विशिष्ट भेंट एवं संतों की श्रद्धा-संवेदना
कार्यक्रम की पूर्णता के पश्चात योगाचार्य पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, भारत सरकार के माननीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी, तथा उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी ने स्वामी जी से विशेष भेंट कर उनके चरणों में श्रद्धा निवेदित की। यह भेंट न केवल आध्यात्मिक संवाद का अवसर बनी, अपितु राष्ट्र और धर्म के समन्वय का एक प्रेरक क्षण भी सिद्ध हुई।
इस दिव्य आयोजन की शोभा बढ़ाने हेतु उत्तर प्रदेश की माननीय राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल जी भी विशेष रूप से पधारीं। उन्होंने न केवल स्वामी जी से आत्मीय भेंट की, अपितु महाकुंभ के आध्यात्मिक वातावरण में सहभागी बनकर त्रिवेणी संगम में पुण्यस्नान भी किया, जिसे उन्होंने एक अविस्मरणीय और दिव्य अनुभव बताया।
भीड़ की विशालता और आवागमन की कठिनाइयों के बावजूद, अनेक संतों एवं महात्माओं ने घंटों की यात्रा कर स्वामी जी के दर्शन हेतु पधारने का संकल्प लिया। उनके आगमन में न कोई थकान थी, न कोई संकोच—केवल श्रद्धा की गंगा और प्रेम की वर्षा थी, जो स्वामी जी के प्रति उनके भावों की गहराई को दर्शाती रही।
यह दृश्य मानो भक्ति, समर्पण और संत-संवाद का एक जीवंत चित्र था, जहाँ हर चरण, हर दृष्टि, और हर वाणी में केवल एक ही भाव था—“स्वामी जी के प्रति अटूट श्रद्धा और प्रेम”।
“चलते–फिरते साक्षात गीता के प्रमाण” – एक जीवन का आलोक
स्वामीनारायण संप्रदाय के पूज्य मुनि श्री भद्रेश स्वामी जी ने कहा—
“स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज केवल गीता के प्रचारक नहीं हैं—वे चलते–फिरते साक्षात गीता हैं। उनके जन्मोत्सव का उत्सव मनाना इस सत्य का उद्घोष है कि भारत भूमि ही संतों की जन्मभूमि है। वे जहाँ जाते हैं, वहाँ धर्म की सुगंध, वेदों की ध्वनि और संस्कृति की ज्योति स्वतः फैल जाती है।”
यह वाक्य केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक सत्य का उद्घाटन है। स्वामी जी का जीवन शांत, स्थिर, और समर्पित है—जो गीता के स्थितप्रज्ञ पुरुष की परिभाषा को सजीव करता है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:। वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
स्वामी जी का जीवन इस श्लोक का साक्षात स्वरूप हैं ऐसा बताते हुए मुनि भद्रेश जी ने कहा कि; जब राष्ट्र में धार्मिक विघटन या संस्कृति पर आघात होता है, तब भी स्वामी जी शांत, संयमित और समाधानकारी रहते हैं। जब सम्मान, पद, प्रतिष्ठा की वर्षा होती है, तब भी वे विनम्रता और निर्लिप्तता के साथ आगे बढ़ते हैं। उनके भीतर राग नहीं, समत्व है; भय नहीं, धर्म का साहस है; क्रोध नहीं, करुणा है। वे संत हैं, परंतु केवल सन्यासधारी नहीं—वे संस्कृति के सेनापति हैं, जो स्थिरता और विवेक के साथ धर्म की रक्षा करते हैं।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
इस श्लोक का सन्दर्भ लेकर मुनि जी ने आगे कहा की स्वामी जी इस श्लोक को अपने जीवन से चरितार्थ करते हैं; उनके पास संपत्ति नहीं, परंतु संपन्नता है—वेदों की, संस्कारों की, संतों की कृपा की। उनके पास कामनाओं की सूची नहीं, परंतु कर्तव्य की ज्योति है। वे सभी प्रकार की प्रशंसा, निमंत्रण, सम्मान को समुद्र की तरह स्वीकार करते हैं—परंतु अचल रहते हैं, तृप्त रहते हैं। उनका जीवन बताता है कि सच्चा संत वह है, जो संसार के मध्य रहकर भी संसार से परे होता है।
सनातन की रक्षा, संस्कृति का आलोक, राष्ट्र का पुनर्जागरण
महाकुंभ के इस दिव्य संगम में गीता परिवार ने जो अमृत-ज्योति प्रज्वलित की है, वह केवल एक आयोजन की स्मृति नहीं— बल्कि सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा, संस्कृति की पुनः चेतना, और राष्ट्र की पुनः जागृति का अमर संकल्प है।
यह यज्ञ… यह मिलन… यह गीता भक्ति दिवस—
तीनों मिलकर उस आध्यात्मिक घोष का रूप बन गए हैं, जो भारत के कण–कण में युगों तक गूंजता रहेगा: “संस्कृति हमारी आत्मा है, गीता हमारा पथ है, और संत हमारे दीप हैं।”
परम पूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज का जीवन स्वयं एक धर्मध्वज है — जो वेदों की रक्षा, गीता के प्रचार और संत परंपरा की अविचल धारा को निरंतर आगे बढ़ा रहा है। यह महायज्ञ कोई समापन नहीं… बल्कि उस युग का आरंभ है—
🌿 जहाँ हर बालक वेदों की ध्वनि में पलेगा,
🌿 जहाँ हर गृहस्थ गीता के श्लोकों में जीवन पाएगा,
🌿 और जहाँ हर संत की वाणी में राष्ट्र का कल्याण गूंजेगा।
आज हम सबका एक ही संकल्प है—
✨ धर्म की रक्षा ही नहीं, धर्म का जीवन में आचरण करें।
✨ संस्कृति को केवल सहेजें नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक प्रवाहित करें।
✨ राष्ट्र की सेवा केवल करें ही नहीं, बल्कि उसे आध्यात्मिक आलोक से आलोकित करें।
जय गीता! जय वेद! जय भारत!
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः