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क्या है ? गीता मैत्री मिलन !
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त्रिभुवन को पवित्र करने वाले सारे जलप्रवाहों में जाह्नवी का जो स्थान है, सातों समुद्रों को पार कर बहने वाली पवन का जो स्थान है, वही स्थान गीता भागिरथी की स्वरगंगा मे विश्व के जन समुदाय को भिगोने के लिए किया गया प्रयास है, गीता मैत्री मिलन। ज्ञान की बहती पवन है गीता मैत्री मिलन।
कर्म ही जीवन रूपी युद्धों के अस्त्र शस्त्र हैं इस भावना का प्रसार है गीता मैत्री मिलन। संक्षेप मे ज्ञान, कर्म, व सद्भावना का आदान प्रदान है, गीता मैत्री मिलन। अहंकार रहित भावना से मन्दिर में प्रज्वलित मन्द दिये की ज्योत है, गीता मैत्री मिलन। गीता मैत्री मिलन दश दिशाओं में गीता ज्ञान का प्रकाश फैलाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ने वाला ऐसा उपक्रम है जो वसुधैव कुटुम्बकम् इस उक्ति को सार्थक करता है।
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गीता मैत्रीमिलन का उद्देश्य क्या है ?
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गीता परिवार के जन समुदाय को एक साथ लाकर कार्यों को परिभाषित कर आपस मे मैत्र व स्नेह संबंध प्रस्थापित करने के लिए गीता मैत्री मिलन का आयोजन किया जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान का प्रसार सारे विश्व में कर, भगवान श्रीकृष्ण का जीवन यापन के लिए दिया गया संदेश जन जन तक पहुंचाना ही इसका मुख्य उद्देश्य है।
सारे विश्व के गीता परिवार की सारी शक्तियों को एकत्रित कर, लक्ष्य प्राप्ति कर समाज को सुसंस्कृत व सशक्त बनाने का लक्ष्य लेकर मित्रता, परोपकार, निरपेक्ष सेवा व सद्भावना का आदान प्रदान गीता मैत्री मिलन का मुख्य उद्देश्य है ।
ऐसा कहते हैं, प्रत्येक बुराई में कुछ अच्छाई छिपी होती है ।
“Every cloud has silver lining “
सन् 2020 मे कोरोना की महामारी के पश्चात् Online गीता संथा वर्ग का रथ परम श्रद्धेय स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरिजी के सारथ्य से चल पडा, और रथी हैं श्रीमान् आशुजी गोयल व श्रीमान् संजयजी मालपाणी। इन online संथा वर्गों मे वैसे तो बहुत ममत्व के साथ वर्ग चलते हैं, किन्तु प्रत्यक्ष मिलन नहीं होता, आमने सामने वार्तालाप नहीं होता। प्रत्यक्ष चर्चा करने के लिए, जनसमुदाय में आध्यात्मिक प्रगती, एकता व अखण्डता को स्थापित करने के लिए गीता मैत्री मिलन का श्रीगणेश, गुरुदेव जी के आशीर्वादोंसह राष्ट्रीय स्तर पर सर्वप्रथम 20मार्च 2022 को यशवंतराव चव्हाण नाट्यगृह कोथरूड पुणे मे प्रातः 9.15 से 11.30 तक श्रीमान् आशूजी गोयल की अध्यक्षता में आयोजित किया गया, उसके बाद तो राष्ट्रीय व आंतरराष्ट्रीय मैत्री मिलन की शृंखला सारे विश्व के गीता परिवार को एकसूत्र मे बांधते चली ।
20मार्च 2022 से 16 August 2025 तक पांच आंतरराष्ट्रीय व 19 राष्ट्रीय, कुल चौबीस मैत्री मिलन गीता परिवार द्वारा आयोजित किये गये, सूची निम्नलिखित है ।
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पाॅंच वर्षों में गीता मैत्री मिलन कब और कहाँ ?
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अध्यक्षीय संदेश के मुख्य अंश
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“Cuckoo doesn’t sing , because she can sing, but she sings, because she has a song to sing“
उसीप्रकार गीता परिवार के मैत्री मिलन, मात्र मिलन ही नहीं वरन् श्रद्धेय स्वामीजी गोविन्ददेव गुरुजी जैसे संतो की वाणी से भगवान के मुखारविन्द से मुखरित, भगवद्गीता के संदेश व समर्पित जीवन गीत हम तक पहुंचाने का प्रयास होता है। पूर्ण समर्पण से किये गये अभ्यास के पश्चात् परम उत्कर्ष की ओर ले जाने वाली गीता को जन जन तक पंहुचाने के लिये सारा गीता परिवार कटिबद्ध है।
परम श्रद्धेय स्वामी श्रीगोविन्ददेव गिरिजी (.सिंगापुर मैत्री मिलन 23 नवम्बर 2023 )
सिंगापुर के 23 नवम्बर 2023 मे आयोजित आंतरराष्ट्रीय मैत्री मिलन पर उद्धृत स्वामीजी के कुछ अंश यहॉं प्रस्तुत हैं। स्वामीजी ने कहा“ भगवद्गीता का मुख्य स्वर मैत्री का है “। शांत, लालन, माधुर्य, दास्य, वात्सल्य भाव तो था ही परन्तु इन सबमें सख्य भाव की प्रधानता दिखती है ।
भगवान अर्जुन को सखा मानते हैं और अर्जुन भी कृष्ण को सखा कहते हैं। सख्यभाव को अभिव्यक्त कर अर्जुन कहते हैं ।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं,
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं,
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥
भगवान अर्जुन से क्या कहते हैं ?
स एवायं मया तेऽद्य,
योगः प्रोक्तः पुरातन।
भक्तोऽसि मे सखा चेति ,
रहस्यं ह्येत दुत्तमम्॥
भगवद्गीता मे बहुत से भाष्य हुए लेकिन ज्ञानेश्वर महाराज के श्रीमुख से क्या निकला ? भगवान कृष्ण कहते हैं “ मै तो निराकार हूं फिर भी साकार बन गया, क्योंकि जो मुझसे इतना प्रेम करते हैं, मुझे एक बार उनके दर्शन करना था ।
स्वामीजी ने आगे कहा “काम अपना करना, याद भगवान को करना। प्रतिदिन गीताजी के कुछ श्लोक अवश्य पढें, न हो सके तो एक श्लोक, यह भी नहीं सके तो एक चरण या
मामनुस्मर युध्य च”।
जीव भगवान का है और शरीर संसार का, शरीर से करना भगवान की सेवा और मन से करना भगवान को याद, तो जीवन आनन्द से चलेगा। भगवान को संतुष्ट कर आप भगवान् तक पहुंच जाते हैं। मामनुस्मर युद्ध च इस छोटेसे टुकडे का इतना बडा अर्थ है।
दूसरा टुकडा है – “कर्मण्यैवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन “ ॥2/ 47॥
मेरा काम मेरा कर्म करना इतना ही है बस ।भगवान फल अवश्य देंगे ,आज नहीं तो कल देंगे , इस जन्म मे नहीं तो अगले जन्म मे देंगे ,
तीसरा टुकड़ा है -“ न में भक्तः प्रणश्यति “9/31”
मेरी भक्ति करने वाले का कभी नाश नहीं होता। संकट नहीं आयेंगे ऐसा नहीं होगा लेकिन संकट से उबारेंगे भगवान् ही ।ये छोटे चरण बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, एक छोटा निर्णायक चरण भी आपका उद्धार करेगा ।
संस्कृति की सेवा करने के लिए, सनातन धर्मियों को एक मंच पर लाने के लिये, बाल मन को मोहने वाले कार्यक्रमों के निर्माण कर, बालपन से ही भारतीय जीवन मूल्यों की स्थापना बालकों मे करने का प्रयास गीता परिवार विविध उपक्रमों से कर रहा है, उसी की एक श्रृंखला है, गीता मैत्री मिलन। भारतीय जीवन मूल्यों की मांग सारे विश्व मे हैं, उसी की पूर्ती व प्रसार करने के लिए कटिबद्ध है,गीता परिवार, गीता पढें, पढायें, जीवन मे लायें इस उक्ति के साथ ।
महामहोपाध्याय श्रद्धेय स्वामी श्रीभद्रेशजी maharaj GMM , USA , !st Oct 23
1 अक्टूबर 2023 को अमेरिका (USA) के न्यू जर्सी में आयोजित गीता मैत्री मिलन में श्रद्धेय स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरिजी के साथ महामहोपाध्याय श्रद्धेय स्वामी श्री भद्रेशजी प्रमुख अतिथि के रूप में विराजमान थे। उनके वक्तव्य के कुछ आशीर्वचन यहाँ प्रस्तुत हैं:
श्रद्धेय स्वामी श्री भद्रेशजी
“सर्वेभ्यो नमो नमः” से आरम्भ कर, समस्त जनसमुदाय से
- “गीता परिवार मेरा परिवार”
- “जब हम एकता से काम करेंगे, पूरे विश्व को वश कर लेंगे”
इन पंक्तियों को दुहराने का आग्रह कर स्वामीजी ने अपना वक्तव्य आरम्भ किया।
मैत्री शब्द की यथार्थ उत्पत्ति-भूमि श्रीमद्भगवद्गीता ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने बारहवें अध्याय में अपने प्रिय भक्तों के लक्षण बतायें –
अद्वेष्टा सर्वभूतानां,
मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहंकारः,
समदुःखसुखः क्षमी ॥१२/१३॥
भक्त का प्रथम लक्षण है अद्वेष्टा और दूसरा मैत्री।
जहाँ-जहाँ भी जीव-संपदा है, वहाँ मैत्री करनी है।
“गीता सामान्य ग्रन्थ नहीं है।”
स्वामी गोविन्ददेव गिरिजी ने ‘हर घर गीता, हर कर गीता’ – यह वाक्य गीता परिवार का समर्पित संकल्प बताया।
स्वामी श्री भद्रेशजी ने इसमें जोड़ते हुए कहा:
“हर कंठ गीता, हर हृदय में गीता। गीता हृदयस्थ हो।”
उन्होंने गीता के 18 अध्यायों का सार अत्यंत मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया:
“श्रीमद्भगवद्गीता किसी व्यक्ति या समाज के लिए लिखा गया ग्रंथ नहीं है – यह सबके लिए लिखा गया विजय ग्रंथ है।”
इस ग्रंथ को क्रम से पढ़ना आवश्यक नहीं, अभ्यास व कंठस्थ करने हेतु क्रम आवश्यक है, परंतु भगवान के हितपूर्ण वाक्य किसी भी अध्याय से पढ़े जा सकते हैं। एक शब्द ही जीवन बदल सकता है।
प्रथम अध्याय केवल अर्जुन का नहीं, हर पढ़ने वाले की आँखों में अश्रु लाता है।
हम दुर्योधन, रावण या कंस को आदर्श नहीं मान सकते। अर्जुन की भूमिका हम सामान्य नागरिकों से मिलती-जुलती होने के साथ उनसे ऊपरी भी है।
अध्याय 1, श्लोक 20:
अथ व्यवस्थितान दृष्ट्वा
धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते
धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥
उत्साह से भरे अर्जुन ने जैसे क्रिकेटर बॅट उठाता है, वैसे गाण्डीव उठाया और कहा:
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत।
लेकिन श्लोक 26 में
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः…॥ 1/26॥
संबंधियों को देखकर भावनाएँ बीच में आ गईं।
अब अर्जुन की उलझन थी: भावनाओं के साथ रहें या दायित्व निभाएँ?
गीता ऐसा ग्रंथ है जो मनुष्य की भावनाओं से जुड़ जाता है। इतना मनोवैज्ञानिक उदाहरण और कहीं नहीं मिलेगा।
भावनावश तो सभी होते हैं, पर अर्जुन जैसे पवित्र नहीं होते।
अर्जुन रो रहा है, शोकग्रस्त है।
वहीं द्वितीय अध्याय के प्रथम श्लोक में भगवान अर्जुन की तीन अवस्थाओं को पहचानते हैं:
- स्थूल शरीर (आँसू)
- सूक्ष्म शरीर (मानसिक भाव)
- कारण शरीर (मोह)
भगवान को अर्जुन रोगी प्रतीत हुए वे वैद्य बनकर उपचार करने लगे।
गीता संवाद अब समस्त विश्व के समक्ष औषधि रूप में है।
जब अर्जुन ने शिष्यत्व स्वीकार किया, तब भगवान ने उनकी शरणागति को स्वीकार किया —
प्रथम शरणागति:
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढ़चेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥ 2/7॥
दूसरी शरणागति:
सर्वधर्मान् परित्यज्य
मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो
मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ 18/66॥
भगवान कहते हैं: मेरी शरण में आ जाओ। पाप से मत डरो, मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा। इन दोनों शरणागतियों के मध्य गीता का प्रवाह गंगा-प्रवाह के समान है।
स्थितप्रज्ञ की भाषा, 18 श्लोकों में ऐषा ब्राह्मी स्थिति को स्पष्ट करती है।
गीता केवल उपदेश नहीं।
गीता ऐतिहासिक प्रश्न से आरंभ होती है, उपदेश बीच में आता है, और फलश्रुति अंत में मिलती है।
अर्जुन अठारहवें अध्याय में कहते हैं-
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा
त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः
करिष्ये वचनं तव॥ 18/73॥
अर्जुन ने यह नहीं कहा कि “मैं युद्ध करूँगा”,
बल्कि कहा “जो आप कहेंगे वही करूँगा।”
यही है “करिष्ये वचनं तव” गीताजी की पूर्णाहुति।
इसके बाद भगवानुवाच नहीं आता।
अब संजय का संवाद शुरू होता है
धृतराष्ट्र दुःखी हैं, लेकिन संजय प्रसन्न हैं।
अंत में संजय कहते हैं:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो
यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा
नीतिर्मतिर्मम॥ 18/78॥
महामहोपाध्याय स्वामी श्री भद्रेशजी ने कहा:
“मैं स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरिजी का शिष्य हूँ। गीता परिवार को ऐसे अद्भुत संत प्राप्त हुए हैं। यदि हम उनके दिखाए मार्ग पर चलें तो गीता का रहस्य सहजता से जीवन में समाहित हो सकता है।”
अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष श्रीमान आशूजी गोयल (मैत्रीमिलन यू. ए. ई. – दुबई,17 मई 2025)
(अध्यक्षीय वक्तव्य के मुख्य अंश)
मम जीवन पाथेय
बदल जाओ वक्त के साथ,
या फिर वक्त को बदलना सीखो।
मजबूरियों को मत कोसो,
हर हाल में चलना सीखो॥
सुन्दर पंक्तियों के साथ “मम जीवन पाथेय” इस मार्गदर्शक सत्र का आरम्भ, श्रद्धेय स्वामी श्री गोविन्ददेव गिरिजी के आकाशवाणी सदृश आशीर्वचनों एवं पारम्परिक प्रार्थना व दीप प्रज्वलन के पश्चात श्री आशू भैया ने किया।
भारतवर्ष से हजारों मील दूर, विभिन्न प्रांतों, भाषाओं, संस्कृतियों से जीवन यापन के लिए UAE (दुबई) में आए हुए पांथिकों को संबोधित करते हुए आशू भैया बोले—
“श्रीमद्भगवद्गीता की आराधना व चिंतन के लिए एकत्रित सभी यह जानते हैं कि गीताजी पढ़ने के बाद हम वह चिराग बन गए हैं जो सदा रोशनी लुटाता है।”
भारत से दूर बसे पथिकों को पाथेय का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा—
- पाथेय क्या है?
हम जिस मार्ग पर चलते हैं वह है पथ, और उस पथ पर चलते समय जो आवश्यक साधन सामग्री (खाद्य पदार्थ आदि) लेकर चलते हैं, वह है पाथेय।
इहलौकिक व पारलौकिक दोनों जीवन को सुसह्य व सुखी करने के लिए आवश्यक प्रयास ही पाथेय है।
इस जीवन में, इहलोक में रहते हुए जो परलोक की व्यवस्था करता है, जिसने मृत्यु को जीवन रहते हुए जीत लिया, वही सच्चा योगी है।
भगवान अर्जुन से कहते हैं कि तपस्वी, ज्ञानी और कर्मकांडी से भी बढ़कर योगी बनो:
तपस्विभ्योऽधिको योगी,
ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी,
तस्माद्योगी भवार्जुन॥ 6/46॥
योगी केवल इस जीवन के सामान्य पाथेय (बल, बुद्धि, ममत्व, वस्तु, व्यक्ति व परिस्थिति) की ही व्यवस्था नहीं करता, वह इहलोक के साथ परलोक के लिए भी पाथेय तैयार करता है।
जिसने पाथेय अच्छे से तैयार किया है, उसे किसी सहारे की आवश्यकता नहीं होती।
जीवन पथ पर चलते हुए तन व मन स्वस्थ रखें, परिवार, मित्रों व समाज की आवश्यकतानुसार अपना अमूल्य समय दान करें।
“दुश्मनी जमकर करो,
लेकिन इतनी गुंजाइश रखो,
कि वापस दोस्त बनो,
तो शर्मिंदा न होना पड़े।”
मित्र व समाज का बंधन बहुत बड़ी ताकत प्रदान करता है।
कभी सुख है, कभी दुःख है,
इसी का नाम जीवन है।
जो दुःख में भी न घबराए,
उसे इंसान कहते हैं॥
- भविष्य निधि
धन को आवश्यक महत्व दें, क्योंकि—
“अर्थ वह धुरी है, जिसके चारों ओर समाज की सारी मानवीय प्रक्रियाएं घूमती हैं।”
धन का आवश्यक व्यवस्थापन अति आवश्यक है।
धन के अभाव को दूर करना आवश्यक है, लेकिन उसके प्रभाव का त्याग भी आवश्यक है।
धन के लिए सुख-शांति, समाज व धर्म को दांव पर न लगाएं।
- धर्म
धर्म क्या है?
धर्म का अर्थ सम्प्रदाय या धार्मिकता नहीं है। उपासना पद्धति धर्म का एक अंग है।
धर्म का अर्थ है – कर्तव्य।
पितृधर्म, मातृधर्म, पुत्रधर्म, राष्ट्रधर्म – जिस भूमिका में हैं, उस कर्तव्य को निभाना ही धर्म है।
जो अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करे, उसका जीवन उन्नत है।
“अधिकार” या “लिबरेशन” – यह कल्पना पाश्चात्य है। हमारे देश में कर्तव्य पालन पर जोर दिया गया है।
कर्तव्य पालन करेंगे तो अधिकार स्वयं मिल जाएंगे।
सत्यम् ब्रूयात्, प्रियम् ब्रूयात्।
न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्।
जिस प्रकार कड़वी दवाई शहद में घोलकर दी जाती है, ठीक वैसे ही मिठास में घोलकर कड़वे सत्य की पैकेजिंग करें।
- Balance Sheet of Life
What is a Balance Sheet?
वह विवरण जो किसी कंपनी की वित्तीय स्थिति स्पष्ट करता है।
What is the Balance Sheet of Life?
वह विवरण जो जीवन की स्थिति को प्रदर्शित करे — वह है Balance Sheet of Life।
“साईं इतना दीजिए,
जामे कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहूं,
साधु न भूखा जाए॥”
महाभारत में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था—
“कौन दरिद्र है?”
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया:
“असंतुष्टः सः दरिद्रः।”
जो पास है उसी में संतुष्ट रहे — वही सच्चा श्रीमंत।
- जीवन की संतुलित Balance Sheet के लिए आवश्यक—
1) परिसम्पत्ति, वैभव (Assets)
जीवन के चार वैभव होते हैं:
A) व्यक्तिगत (Personal)
B) व्यावसायिक (Professional)
C) सामाजिक (Social)
D) आध्यात्मिक (Spiritual)
आपकी व्यक्तिगत संपत्ति, व्यावसायिक प्रगति, समाज में स्थान, और आध्यात्मिक उन्नति — इन चार मुख्य स्तंभों पर जीवन टिका है।
ये स्तंभ मजबूत हों, तो जीवन वैभवसम्पन्न जानिए।
- दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण:
- न अति दैन्यम्
- न अतिमानिता
अति दैन्य का प्रदर्शन उचित नहीं।
यहाँ भर्तृहरि नीतिशतकम् का एक श्लोक स्मरणीय है—
रे रे चातक, सावधान मनसा,
मित्र! क्षणं शृणुताम्।
अम्भोदाः बहवः सन्ति गगने,
सर्वेऽपि नैतादृशाः।
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतः,
मा ब्रूहि दीनं वचः॥
वर्षा ऋतु में चातक पक्षी आशा से प्रत्येक मेघ को ताकता है, पर कवि कहता है— “रे चातक! आशा से हर मेघ को मत ताक, सभी मेघ समान नहीं होते।”
“खुदी को कर बुलंद इतना,
कि खुदा बंदे से पूछे –
तेरी रज़ा क्या है!”
तात्पर्य:
न तो अति दीनता उचित है, न अतिमानिता।
अतिमानिता अहंकार दर्शाती है —
“I am self-sufficient. I don’t need anybody.”
Such super ego is not appreciated.
धन इतना देना प्रभुजी,
कि हमारी आवश्यकताएं पूर्ण हो जाएं।
- Anger
क्रोध की एक छोटी सी चिन्गारी सर्वनाश का कारण बनती है ।
क्रोध क्यों आता है ?
कामना मे विघ्न का आना , अहंकार पर चोट , मोह या लोभ ,क्रोध के कारण हैं ।
क्रोध को कैसे काबू मे करें ?
क्रोध आरम्भ मे छोटा होता है लेकिन heated argument से , वाद विवाद से वह बडा हो जाता है । क्रोध को छोटा रहते रोको .
- दो शब्द मॉं के लिये , दो शब्द पिता के लिये
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श्री आशूजी ने इस सत्र के प्रारम्भ मे पालकत्व के कुछ आयाम स्पष्ट किये ।
हम कहॉं चूक गये ?
हमने बच्चों को जीव शास्त्र सिखाया लेकिन जीवन शास्त्र नहीं , चित्रकला सिखाई लेकिन चरित्र कला सिखाना भूल गये , अंकगणित पढ़ाया लेकिन जीवन के गणित के कुछ प्रश्नों का हल बताने में हम चूक गये । सुखों की खोज में हम इतना भटक गये कि हमने शांति खो दी । इतिहास पढ़ाया लेकिन ऐतिहासिक नायकों की जीवन गाथा नहीं बताई
शान्ति खोजने निकले और शान्ति को ही दॉंव पर लगा दिया ।
आज का बच्चा पझल में फॅंस गया है । किस टुकडे को कहॉं फिट करना नहीं जानता ।
जब भावनायें जुड़ जाती हैं तो हमें चीज़ें जैसी हैं वैसी दिखाई नहीं देतीं ।
प्रकृति व समाज के दबाव में आकर हम बच्चों पर दबाव डालते हैं । अपेक्षाओं का पहाड़ बच्चे पर लाद देते हैं । दबाव बढ़ा आत्मविश्वास घटा ।
Every individual is different , competition के भॅंवर मे फॅंसकर बच्चा आत्मविश्वास ही खो देता है ,
स्वामीजी कहते हैं “when confidence is lost every thing is lost for ever and ever ।
Boost up the morale of your child by giving appropriate time for active listening .
माली बीज बोता है पौधे उगते हैं , वह हर पौधे की आवश्यकतानुसार अलग अलग व्यवहार करता है , किसी को धूप में, किसी को छांव मे , किसी को कम पानी , किसी को अधिक पानी , किसी को कम खाद , किसी को अधिक खाद डालता है । तभी सुन्दर रंगबिरंगे विविध गंध व स्वरूप के फूलों से उपवन सज जाता है।
बच्चों के जीवन की बगिया को सुन्दर बनाने के लिये उनकी आवश्यकता पहिचान कर सुविधायें प्रदान करना माता पिता का परम कर्तव्य है । जैसा फूल आना हो वैसा वातावरण प्रदान करना है ।
गीता मैत्री मिलन ( धुलिया) महाराष्ट्र
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श्रीमान संञ्जयजी मालपाणी ( गीता मैत्री मिलन , धुलिया, महाराष्ट्र २/४/२०२५)
अध्यक्षीय मैत्री संवाद
स्नेहश्रीमन्त श्रीराधाकृष्ण महाराजजी की कथा के बीच गीतापरिवार के राष्ट्राध्यक्ष श्री संञ्जय मालपाणीजी को वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया । समस्त कार्यकर्ताओं का अभिवादन कर ,संञ्जय भैया ने गीता परिवार के ऑनलाइन संथा वर्ग के प्रारम्भ का इतिहास कथन किया । लखनऊ की एक बहिन झूम पर ऑनलाइन क्लास ले रही थीं, संजय भैया ने ऑडियो व विडिओ बन्द रखकर चुपचाप निरीक्षण किया और आशू भैया से फोन पर लिंक की मॉंग की ,पॉंच मिनट में २५० साधक गीता पढ़ने के लिये तैयार हो गये । तब वाट्सएप पर एक लिंक में २५० लोग ही मीटिंग के लिये जुड़ सकते थे । लोगों को झूम लिंक की जानकारी नहीं थी । दूसरी , तीसरी लिंक भी फुल हो गयीं । कोरोना की महामारी से त्रस्त मन को शांती मिली ।२५०० साधकों के साथ शान से गीता संथा वर्ग का बिगुल बजा । आदरणीय सुवर्णा काकीजी को क्लास लेने के लिये आमंत्रित किया , वे अपने साथ पचीस महिलायें पढाने के लिये लेकर आंयी ,। बचपन मे मैने एककहानी सुना थी कि “ जब एक दुर्गा खडी होती है तो सहस्र हाथ निकल आते हैं । दुर्गा काकीजी की भी सहस्र भुजायें निकल आयीं और गीता वर्गों का प्रसव हुआ “।यह था नारी शक्ति का प्रमाण , हजारों वर्षों से जो देश कभी अंग्रेज , कभी मुगल , कभी पोर्तुगीजों का गुलाम था ,इस देश के स्वत्व व सत्व का ह्रास न हो पाया ,उसका एकमात्र कारण नारीयों की ऊर्जा , शक्ति था । एक हजार वर्षों पहले जब अग्नि वर्षा हुई उस समय हमारे सारे परिवार घरों मे दुबककर बैठे थे तब संत ज्ञानेश्वर महाराज की ज्ञानेश्वरी , एकनाथ महाराज की भागवत और श्रीमद्भगवद्गीता इन ग्रंथों का नन्दादीप घर घर में प्रदीप्त कर रखा , वे इस देश की महिलायें हैं , जिन्होंने इसे संजोकर रखा इसिलिये धर्म बचा , संस्कार बने रहे पचीस महिलाओं ने बारहॅंवा अध्याय सिखाने की तैयारी प्रदर्शित की । बीस दिनों का समय था , तब भगवद्गीता के PDF तैयार किये गये ,अनुस्वार के उच्चारण तयार किये गये । संस्कृत का अभ्यास न था , तब संस्कृत के एक विद्वान थे जिन्होने पाणिनी के व्याकरण की जानकारी दी । क्, च्, ट्, त् प् वर्गों व पाँचवाँ अनुनासिक अनुस्वार का उच्चारण क्यों व कैसे यह जाना अनुस्वार के उच्चारण कोष्ठक में लिखे गये । सारी गीताजी सरल हो गयी, लेकिन किन्ही संस्कृत के विद्वान महोदय ने श्रीस्वामीजी को फोन किया ।क्या चल रहा है गीता परिवार मे ?कोष्टक मे अनुस्वार का उच्चारण कैसे दिया? यह तो संस्कृत की गरिमा का पतन है , स्वामीजी के पास शिकायत की , स्वामीजी ने संजय भैया को फोन किया और पूछा क्या चल रहा है गीता परिवार मे ?
संजय भैया बोले “बहुत बढ़ियाँ चल रहा है स्वामीजी,२५०० लोग गीता सीख रहे हैं “।
स्वामीजी ने कहा “संस्कृत पण्डित नाराज़ हो रहे हैं “।
संजय भैया – क्यों नाराज़ होरहे हैं ?
स्वामीजी – क्योंकिअनुस्वार के लिए संस्कृत में यह नियम नहीं है ।
संजयभैया – जब पाणिनीजी ने नियम बनाये तो क्या तब किसी ने कोई शिकायत की ?लोगों को समझाने के लिये नियम बनाये गये थे ।वे नियम पाणिनी जी ने बनाये थे , गीताजी को सरल पठनीय बनाने के लिये , ये नियम इस मालपाणी ने बनाये हैं ।
स्वामीजी – सुधारणावादी व तात्विक विचारों वाले हैं , परम्पराओं का पालन करते हुये आधुनिकता को अपनाते हैं उन्होने स्वीकृती दी और गीता संथा वर्ग की गाडी पटरी पर दौडने लगी ।
मैत्री हृदय से होती है , जिसके हृदय मे गीताजी बस गयीं , वे कम से कम दो अध्याय अवश्य कण्ठस्थ करेंगे , जिज्ञासू ,पाठक ,पथिक व गीताव्रती तक का प्रवास बडा सुखदायी व आनन्द देने वाला है , लेकिन साथ ही कभी कभी अहंकार भी आता है ।स्वामीजी सम्मानित करते हैं , यह बहुत बडी बात है । गीता परिवार मे बयासी वर्ष की एक महिला गीताव्रती हो गयीं उन्हे देखकर संजय भैयाजी नतमस्तक हो गये ,
गीताजी मे अंत मे भगवान कहते हैं “ सर्व धर्मान्परित्यज्य,
मामेकं(म्) शरण(वॅं) व्रज।
अहं(न्) त्वा सर्वपापेभ्यो,
मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
संजय भैया ने कहा “मुझसे किसी ने पूछा सोलहवें अध्याय तक तो भगवान धर्म श्रेष्ठ बता रहे थे ।अर्जुन से क्षत्रिय धर्म का पालन कर ,युद्ध करने के लिये कह रहे थे और अब कहते हैं ——-सर्वधर्मान्परित्यज्य ,
मामेकं(वॅं) शरणं(वॅं) व्रज ।
शिक्षक का शिक्षक धर्म , माता का मातृ धर्म , पिता की पितृ धर्म , पुत्र का पुत्र धर्म , राष्ट्र का राष्ट्रधर्म सभी को त्यागो यह क्यों ? हमने जो कर्तव्य चयन किया है वह हमारा धर्म है । अचानक धर्म की व्याख्या कैसे बदल गयी । प्रथम अभ्यासित सत्रह अध्याय व्यर्थ गये”।
संजय भैया ने स्पष्टीकरण दिया –
“ धर्म के पालन के साथ जो अहंकार आता है ,पुत्र के यश पर पिता को , शिष्य के धर्म पालन पर शिक्षक अपना सीना तानता है ।सैनिक परमवीरचक्र सीने पर लगाकर गौरवान्वित होता है । छात्र के पराक्रम पर शिक्षक फूला नहीं समाता । जब तक कर्तव्यपूर्ती का समाधान है ,सब सुचारू रूप से चलेगा किन्तु कर्तव्य पूर्ति के साथ जो अहंकार जुड़ गया , उसका परित्याग ही
सर्व धर्मपरित्याग है ।
योगासन् का नियम् है , आगे झुकना है तो सॉंस को पूर्ण रूप से बाहर निकालना होता है।
अन्दर शून्य निर्माण करना होता है , जब तक सारी सॉंस बाहर नहीं निकल जाती आगे झुकना सरल नहीं होता । यदि नतमस्तक होना है ,तो भी सीना खाली करना पड़ता है और भगवान यही कहते हैं ,
मामेकं(वॅं) शरणं(वॅं) व्रज “,
मात्र सॉंस ही नहीं ,सीने के अन्दर का अहंकार भी जब तक बाहर नहीं फेंकते शरणागति नहीं होती ।
शरणागति के साथ ही व्यक्ति निर्विचार बनता है ।निर्विचारिता के साथ ही निर्विकारिता भी आती है ।
यह योगशास्त्र है । भगवद्गीता स्वयं यह कहती है “
“ज्ञान विज्ञान सहितंम् ,
यज्ञात्वा मोक्ष्यसे शुभात्”।
भगवान के मुख मे प्रथम अध्याय मे एक भी श्लोक नही है । महारथी अर्जुन ऑंसू ढाल रहा है ।उसका मन भ्रमित हो गया , और वह रथ के पीछे बैठ गया । कृष्ण तो कुछ भी न बोले फिर यह कैसा कृष्णार्जुन संवाद ? लेकिन संवाद के लिये दोनों का बोलना आवश्यक नहीं है एक बोले दूसरा ध्यान से सुनें तब भी वह संवाद ही रहता है ।
भगवद्गीता यह योगशास्त्र है , अष्टांग योग में योग गीताजी के अध्यायों से ही आये हैं । यह ज्ञान है , यह विज्ञान है ,भगवान नवें अध्याय में कहते हैं ….
“ ज्ञान विज्ञान सहितम् ,
यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥९/१॥
विज्ञान मे शरीर शास्त्र सम्मिलित है । शरीर के साथ मन को भी स्वस्थ रखना आवश्यक है , मन तभी स्वस्थ रहेगा , जब प्राण व अपान में समत्व होगा ।
योग की प्रथम परिभाषा है “ समत्वं योग उच्यते “भगवान संतुलन की बात कर रहे हैं”।गीता पठन से स्वभाव व शारीरिक परिवर्तन आता है ,क्योकि प्राण व अपान समान होते हैं । ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है निराशा , क्रोध नकारात्मकता समाप्त हो जाती है व सारे निर्णय सही होने लगते हैं ।भय व चिन्ता ऑक्सीजन का स्तर कम करती है जिससे मन भ्रमित होता है ।
समं (ङ्) काय शिरोग्रीवं(न्) धारयन्नचलं(म्) स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं(म्) स्वं(न्)
दिशश्चानवलोकयन्॥६/१३॥
शरीर , ग्रीवा व शीश को सम कर नासिका के अग्र पर दृष्टी लगाकर , दश दिशाओं को बन्द कर , अन्दर झॉंको , धारा को उल्टा बहाओ ,उसे मोक्ष देने वाली राधा बनाओ ।
सारी दैवी गुण सम्पदा स्वयं(म्) में समाओ व पढ़ाओ ।
लोक मन संस्कार करना यह परम गति साधना है । संस्कार कार्य का उपक्रम जीवन में लायें और बालकों को सुसंस्कारित करें ।
जीवन एक रंगावली है । कितने बिन्दुओं की यह तो विधाता के हाथ है किन्तु उन बिन्दुओं को जोड़ना व उनमें रंग भरना हमारे हाथ मे है ।
तो आईये हम सब मिलकर भक्तिभाव से मैत्री के रंग भरें ।
🌹🌹जय श्रीकृष्ण 🌹🌹